Monday, 18 June 2012

कैग की रिपोर्ट के बाद हम पीएम को ईमानदार क्यों माने?

कोयला खदानों के आवंटन पर कैग की अंतिम रिपोर्ट ने सीधे-सीधे सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए कहा है कि उसने कंपनियों को चुनते समय पारदर्शी प्रक्रिया का पालन नहीं किया। रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया है कि कोयला मंत्रालय के सेक्रेटरी की 2004 में की गई उस सिफारिश को नजरअंदाज करना गलत था, जिसमें प्रतिस्पर्धी बोलियों के जरिए खदानों के आवंटन की सिफारिश की गई थी। रिपोर्ट की विषयवस्तु की जानकारी रखने वाले लोगों ने बताया कि कैग ने पाया है कि कोयला खदानों के खनन के लिए कंपनियों को किस तरह चुना गया, इस बारे में कोई सूचना उपलब्ध नहीं है।
यह रिपोर्ट संसद के मॉनसून सेशन में पेश की जाएगी। रिपोर्ट के प्रमुख बिंदुओं की जानकारी रखने वाले व्यक्तियों में से एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने कहा कि कैग के मुताबिक कोल माइंस के आवंटन में प्रतिस्पर्धी बोलियां मंगाई जानी चाहिए थी, लेकिन इसकी जगह सरकार ने एक 'अपारदर्शी' नीति का सहारा लिया, जो फरवरी 2012 तक चलन में थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन कंपनियों को ये खान आवंटित किए गए, उन्हें करीब 1,86,000 करोड़ रुपए का फायदा हुआ।इससे फायदा उठाने वालों में अन्य कंपिनयों के अलावा जिंदल स्टील ऐंड पावर और टाटा एवं दक्षिण अफ्रीका की सासोल के बीच जॉइंट वेंचर से बनी एक कंपनी भी शामिल हैं।
जिस समय के आवंटन को लेकर कैग ने ये तल्ख टिप्पणियां की हैं, उस दौरान कोयला मंत्रालय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पास था और राज्य स्तर के मंत्री दसरी नारायण राव और संतोष बगरोदिया उनके सहयोगी थे। उस समय के कोयला सेक्रेटरी पी. सी. पारेख ने स्वीकार किया कि कुछ खास कंपनियों को खदान आवंटित करने के लिए उन पर 'दबाव' था। उन्होंने कहा, 'हां, उस समय दबाव था और हर तरह के लोग आ रहे थे और किसी खास कंपनी के पक्ष में फैसले की मांग कर रहे थे।' पारेख ने 2004 में कोयला राज्य मंत्री राव को एक नोट पेश किया था, जिसमें पारदर्शिता के नियमों का पालन करते हुए ब्लॉक के आवंटन में प्रतिस्पर्धी बोलियों की व्यवस्था लागू करने का प्रस्ताव किया गया था।
   दोस्तों, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ईमानदार हैं या बेईमान, ये हमेशा चर्चा का विषय रहा है।लेकिन अब कैग की रिपोर्ट ने लोगों की इस उलझन को दूर कर दिया है।वैसे अब तक देश के हालात को देखते हुए भी हम अंदाजा लगा सकते थे कि पीएम ईमानदार हैं या नहीं लेकिन कैग की इस रिपोर्ट ने लोगों को पीएम की ईमानदारी पर फैसला करने के लिए एक ठोस आधार दे दिया।अब तक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर कोई व्यक्तिगत भ्रष्टाचार के आरोप साबित नहीं हुए थे लेकिन इस बार कैग ने उनकी 'ईमानदारी' की बखिया ऊधेड़ दी।
   अब तक जब टीम अन्ना कैग की कुछ रिपोर्टों का हवाला देकर प्रधानमंत्री पर सवाल उठाती थी तो सरकार के ठेकेदार उसे तुरंत खारिज कर देते थे।टीम अन्ना के आरोपों पर प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री वी. नारायणसामी ने जवाबी खत लिखकर पीएम पर लगे आरोपों को बेबुनियाद और मनगढ़ंत बताया था और जाँच की माँग ठुकरा दिया था।यहाँ तक कि पीएम ने भी अपने ऊपर लगे आरोपों को सिरे से नकार दिया था और दुर्भाग्यपूर्ण बताया था।वर्तमान कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल कहते आ रहे हैं कि कोयला ब्लॉक आवंटन में कोई गड़बड़ी नहीं हुई थी।कैग की कोयला ब्लॉक आवंटन पर अंतिम रिपोर्ट ने इन सभी को करारा जवाब दिया है।
   कैग की रिपोर्ट पेश होने के बावजूद सरकार कह रही है कि उसे रिपोर्ट नहीं मिली है।आपको रिपोर्ट नहीं मिली तो क्या हुआ, जनता के सामने रिपोर्ट आ चुकी है और इस पर आपको जवाब देना होगा।कोयला मंत्री तो अभी तक कह रहे हैं कि कोयला ब्लॉक आवंटन में कोई गड़बड़ी हुई ही नहीं।तो क्या कोयला मंत्री कैग की रिपोर्ट भी नहीं मानेंगे?मुझे नहीं लगता कि वर्तमान कोयला मंत्री इतने योग्य और काबिल हैं कि कैग की विश्वसनीयता पर सवाल उठा सकें।सरकार अब भी कह रही है कि 'कोलगेट' जैसा कोई घोटाला हुआ ही नहीं।सरकार को अब और क्या सबूत चाहिए?कैग ने अपनी रिपोर्ट में साबित कर दिया है कि कोयला ब्लॉक आवंटन में गड़बड़ी हुई थी तब भी सरकार नहीं मान रही है, तो क्या अब कैग कोयला ब्लॉक आवंटन के 'मुख्य आरोपी' की पिटाई करेगा, तब मानेगी यह सरकार?
   सरकार के कुछ सही को गलत और गलत को सही कहने वाले ठेकेदार अब भी कह रहे हैं कि पीएम ईमानदार हैं।अगर कैग की रिपोर्ट आने के बावजूद कुछ लोग पीएम को ईमानदार बता रहे हैं, तो क्या वो कैग को बेईमान बताना चाहते हैं?कैग की रिपोर्ट के बाद तो पीएम ईमानदार हो ही नहीं सकते।पीएम देश को बताएँ कि कैग की रिपोर्ट आने के बावजूद हम आपको ईमानदार क्यों माने?और अगर नहीं बता सकते तो इस्तीफा दे दें।
   जिस कैग की रिपोर्ट के कारण ही 2 जी मामले पर राजा को आरोपी बनाया गया (भले ही न्यायिक प्रक्रिया त्रुटिपूर्ण होने के कारण आज वो सलाखों से बाहर हैं) उसी कैग की रिपोर्ट के आधार पर हम प्रधानमंत्री को आरोपी क्यों नहीं मान सकते?
   पीएम ने तो बड़ी आसानी से कह दिया कि उन पर आरोप साबित हो गए तो वो राजनीति से संन्यास ले लेंगे।संन्यास लेने की तो वैसे भी उम्र हो ही गई है उनकी, ये सब बातें बोलकर वे किसे बेवकूफ़ बना रहे हैं?पहले पीएम देश को ये बताएँ कि देश में ऐसी कौन सी एजेंसी बची है जो निष्पक्ष रूप से जाँच कर अगर सचमुच पीएम दोषी हैं तो उन्हें आरोपी साबित कर सके।कहने को तो कोयला ब्लॉक आवंटन मामले में सीबीआई जाँच कर रही है लेकिन सभी जानते हैं कि सीबीआई के जाँच का स्तर क्या है।आरोपी साबित होने के बाद क्या करना है, यह भी पीएम ने बता दिया।जेल नहीं जाएँगे बल्कि राजनीति से संन्यास लेंगे।शायद पीएम को पता नहीं है कि राष्ट्रपति बनना भी राजनीति से संन्यास लेना ही होता है।अगर आरोपी साबित होने पर पीएम को संन्यास लेने का मन है तो वो किस बात का इंतजार कर रहे हैं।कैग की रिपोर्ट उनके संन्यास लेने के लिए काफी है, कम से कम देश के सर से बहुत बड़ा बोझ उतर जाएगा।कैग की रिपोर्ट आने के बाद इतना तो तय है कि कोयला ब्लॉक आवंटन में भारी अनियमितता हुई है और चुकी उस वक्त कोयला मंत्रालय पीएम के पास था इसलिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रिपोर्ट के आधार पर पीएम ही दोषी हुए।और अगर अब भी पीएम खुद को ईमानदार बताते हैं तो वो बताएँ कि तत्कालीन कोयला मंत्री होने के बावजूद अगर आप निर्दोष हैं, तो दोषी कौन है?भले ही कोयला ब्लॉक आवंटन से पीएम को कोई व्यक्तिगत फायदा न हुआ हो(शायद) लेकिन उनके पद पर रहते हुए कई कंपनियों को बेहिसाब फायदा हुआ है जिससे सरकारी खजाने को अब तक की सबसे बड़ी चपत लगी है।इतने गंभीर मुद्दे पर संसद में खड़े होकर सिर्फ इतना कहकर कि आरोप साबित होने पर आप संन्यास ले लेंगे, आप पल्ला नहीं झाड़ सकते।कल को ए. राजा भी कह सकते हैं कि उन पर आरोप साबित हो गए तो वो राजनीति से संन्यास ले लेंगे, तो क्या हम उन्हें निर्दोष मान लेंगे?
   जिस पीएम के कार्यकाल में देश के सबसे बड़े-बड़े घोटाले हुए हो, जिस पीएम के कार्यकाल में घोटाले थमने का नाम नहीं ले रहे हो, जिस पीएम पर कैग जैसे संवैधानिक संस्था भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आरोप लगा रही है, वह पीएम किसी भी सूरत में ईमानदार नहीं हो सकते।अब भी पीएम को ईमानदार कहना तो कैग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाना होगा।
   प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री की परिभाषा बदल दी है।पहले हम माना करते थे कि सरकार में पीएम सबसे 'मजबूत' व्यक्ति होते हैं लेकिन अब हम मानते हैं कि सरकार में पीएम सबसे 'मजबूर' व्यक्ति होते हैं।प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश को जो जख्म दिए हैं वो कभी नहीं भर सकते।प्रधानमंत्री के नाम पर देश में शून्यता छा चुकी है।हम आमतौर पर किसी सरकार के मुखिया का नाम सरकार से पहले कहा करते हैं।लेकिन प्रधानमंत्री ने ऐसे हालात पैदा कर दिए हैं कि अब तो इस सरकार को 'मनमोहन सरकार' कहने में भी शर्म आती है।जितने गैरजिम्मेदाराना तरीके से पीएम देश चला रहे हैं, वैसे तो कोई गरीब, निर्धन भी अपना घर नहीं चलाता।मौजूदा पीएम देश चलाते हुए जितना टालू रवैया अपना रहे हैं, बच्चे जब गूड्डे-गूड्डी का खेल खेलते हैं तब भी वे मौजूदा पीएम से ज्यादा गंभीर रहते हैं।बच्चों को आप चाहे किसी काम में भी लगा दें वो अपना बेस्ट देने की कोशिश करते हैं, कम से कम पीएम बच्चोँ से तो सीख लें।
   धन्यवाद और साधुवाद के पात्र हैं कैग विनोद राय, जिन्होंने सरकार के कई घोटालों से पर्दा उठाया और लगातार पूरी ईमानदारी से देश को अपनी सेवा दे रहे हैं।उनकी कार्यशैली को देखते हुए ऐसा लगता है कि उन्हें इस बात की चिंता नहीं है कि रिटायरमेंट के बाद उन्हें कोई महामहिम का पद मिल जाए, वो बस ईमानदारी से अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं।आज देश को उनके जैसे ही अफसरों की जरूरत है।आज तक कैग कभी इतना सक्रिय नहीं रहा जितना अभी है।इससे पहले भी देश में कई कैग हुए लेकिन विनोद राय जी ने अपनी कार्यशैली से ऐसी पहचान बनाई है कि आने वाले पीढ़ी कैग के रूप में इनके कार्यों को जरूर याद करेगी।सचमुच कैग के रूप में विनोद राय जी का कार्य अब तक सराहनीय रहा है।पहली बार देश ने जाना कि कैग भी सरकार के गलत कामों के लिए उसकी धज्जियाँ उड़ा सकती है।
   सरकार चाहे कुछ भी कहे लेकिन मुझे नहीं लगता कि देश की बुद्धिमान जनता अब भी पीएम को ईमानदार मानेगी।प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भ्रष्टाचारियों के रक्षक हैं।सभी भ्रष्टाचारी भ्रष्टाचार करने के बाद प्रधानमंत्री की ईमानदारी का उलाहना देने लगते हैं।मौजूदा प्रधानमंत्री ने देश में अपनी कोई छवि ही नहीं बनाई है, उन्होंने देश को धोखा दिया है, जनता की आँखों में धूल झोंका है।मैं तो अब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को बिल्कुल भी ईमानदार नहीं मानता क्योंकि मुझे मनमोहन सिंह, वी. नारायणसामी और श्रीप्रकाश जायसवाल से ज्यादा भरोसा कैग पर है।क्या अब भी आप पीएम को ईमानदार मानते हैं?
जय हिन्द! जय भारत!

Thursday, 17 May 2012

कल तक था स्कैंडलमैन, आज बन गया जेंटलमैन?

दोस्तों, आज सुबह का अखबार खोलते ही देखा कि ए. राजा की हंसती हुई तस्वीर मुख्य पृष्ठ पर है।देख कर सोचा कि आखिर 'राजा' ने ऐसा कौन सा महान काम कर दिया कि हंसती हुई तस्वीर अखबार के मुख्य पृष्ठ पर छपी है।तभी ध्यान आया कि 15 मई 2012 को तो दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट से ए. राजा को जमानत मिल चुकी है।शायद इसलिए 'राजा' देश की कानून व्यवस्था पर हँस रहे होंगे कि देश का सबसे बड़ा घोटाला करने के बावजूद उन्हें जमानत मिल गई।सोच रहे होंगे कि इतनी आसानी से जमानत मिल जाती है, मैंने पहले क्यों नहीं याचिका दी?जनाब याचिका देते भी कैसे?जिसके आदेश पर देश को लूटा है, जब तक उसका आदेश न आए याचिका देते भी कैसे?
   गौरतलब है कि 1 लाख 76 हजार करोड़ के 2g घोटाले के सभी 14 आरोपी(राजा को लेकर) जमानत पर रिहा हो चुके हैं।कनिमोझी, तत्कालीन टेलीकॉम सचिव सिद्धार्थ बेहुरा, राजा के तत्कालीन निजी सचिव आर.के. चंदोलिया, यूनिटेक वायरलेस के एमडी संजय चंद्रा, रिलायंस के ग्रूप एमडी गौतम दोषी, रिलायंस के सीनियर वाइस प्रेजीडेंट हरी नायर और सुरेंद्र पिपारा, डीबी रियलीटी और स्वान टेलीकॉम के प्रोमोटर और एमडी विनोद गोयनका, डीबी रियलीटी और स्वान टेलीकॉम के प्रोमोटर शाहिद बलवा और उनके भाई आसिफ बलवा, राजीव अग्रवाल, कलैगनार टीवी के एमडी शरत कुमार, करीम मोरानी, और अब तत्कालीन टेलीकॉम मंत्री ए. राजा भी जमानत पर रिहा हो चुके हैं।ए. राजा ने पहली बार 9 मई को जमानत की गुहार लगाई थी और 15 मई 2012 को उन्हें जमानत मिल भी गई।जैसा की श्री सुब्रमण्यन स्वामी ने कहा कि आश्चर्य इस बात पर नहीं है कि राजा रिहा हो गए बल्कि आश्चर्य तो इस बात का है कि आखिर 15 महीने वो जेल में रह कैसे गए।शायद आलाकमान ने उन्हें याचिका दाखिल करने की इजाजत इसलिए नहीं दी होगी कि जब भी 2जी का मामला उठे तो सरकार दिखा सके कि उसने राजा के रूप में आरोपी को सजा दिलाई है।और जब एक-एक कर सारे भ्रष्टाचारी बाहर हो गए तो अंत में आलाकमान ने राजा को भी याचिका देने की इजाजत दे दी।आखिर जब सभी भ्रष्टाचारी बाहर आ गए तो भला राजा को कैसे बर्दाश्त होता।जिस तरह से पटियाला हाउस कोर्ट से भ्रष्टाचारियों और देशद्रोहियों को न्याय मिलता जा रहा है, लगता है आने वाले दिनों में वह भ्रष्टाचारियों के लिए 'पवित्र' और राष्ट्र के लिए 'अपवित्र' स्थल बन जाएगा।
   सरकार और न्यायपालिका दोनों मिलकर जनता को किस हद तक बेवकूफ़ बनाते हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब 2जी घोटाले ने मीडिया में तूल पकड़ा तो सरकार ने जनता को मूर्ख बनाने के लिए कुछ आरोपियों को जेल भिजवा दिया और जब मामला थोड़ा ठंडा पड़ा तो सभी भ्रष्टाचारी बाहर आ गए।ठीक यही हालत सीडब्ल्यूजी घोटाले की भी हुई।जनता को बेवकूफ़ बनाने के लिए कलमाड़ी को कुछ समय के लिए जेल भेज दिया गया और फिर वो भी हँसते-खिलखिलाते बाहर आ गए।ये सरकार और न्यायपालिका ने मिलकर एक नई प्रक्रिया बना दी है।पहले सरकार देश को लूटे, मामला सामने आने पर न्यायपालिका के मिलीभगत से देश को मूर्ख बनाने के लिए दो-चार आरोपियों को जेल भेजे और फिर मामला ठंडा होने पर न्यायपालिका के द्वारा सभी भ्रष्टाचारियों को जमानत दिलवाए।जमानत मिलते ही बड़े से बड़ा घोटाला समाप्त हो जाता है।यह शायद अब देश की कानूनी किताब का एकमात्र चैप्टर रह चुका है।ये न्यायपालिका के लिए शर्म की बात है कि देश का सबसे बड़ा घोटाला(2जी) के एक भी आरोपी इस वक्त जेल में नहीं हैं।सभी को जमानत दे दी है।और इसी के साथ सरकार और न्यायपालिका के मिलीभगत से 2जी घोटाले का मामला दफन हो गया।सीडब्ल्यूजी घोटाला तो कलमाड़ी के जमानत के साथ ही दफन हो चुका है।पता नहीं आगे सरकार और न्यायपालिका की ये दोस्ती राष्ट्र को और कितना शर्मशार करेगी!
   भारत की कानून-व्यवस्था इतनी खोखली है कि यहाँ एक भ्रष्टाचारी के वकील द्वारा भी यह दलील दी जाती है कि उनके मुवक्किल ने बहुत समय जेल में बिता लिया, अब उन्हें छोड़ दिया जाए।और कोर्ट भी मात्र इस आधार पर बेल दे देती है कि जब इस मामले के सभी आरोपी रिहा हो चुके हैं तो राजा क्यों नहीं?आखिर ये कानून का खोखलापन नहीं तो और क्या है? सीबीआई के विशेष अदालत के जज ओ.पी. सैनी ने कहा कि जब 2जी मामले के सभी आरोपी रिहा हो चुके हैं तो राजा को भी जेल में रखने से कोई मकसद पूरा नहीं होता।सैनी जी यह बताएँ कि भ्रष्टाचारी को सजा दिलवाना न्यायपालिका का मकसद नहीं तो क्या है?क्या अब भ्रष्टाचारी को छुड़वाना ही न्यायपालिका का मकसद बन गया है?कोई न्यायाधीश इस बात पर चिंता प्रकट नहीं कर रहे हैं कि आखिर पहले सीडब्ल्यूजी और अब 2जी घोटाले के सभी आरोपी बाहर कैसे आ गए?बल्कि न्यायाधीश तो गर्व से यह फैसला सुनाकर कि जब सभी आरोपी जमानत पर रिहा हो गए तो राजा को भी जमानत मिलनी चाहिए, एक भ्रष्टाचारी की वकालत कर रहे हैं।आखिर राजा और कलमाड़ी जैसे भ्रष्टाचारियों और राष्ट्र के लूटेरों को जमानत देकर न्यायपालिका क्या साबित करना चाह रही है?कल तक जो जेल में बंद रहते हैं, उन देशद्रोहियों को जमानत देकर न्यायपालिका समाज को क्या संदेश देना चाह रही है?क्या यह कि अब देश सीडब्ल्यूजी और 2जी जैसे बड़े घोटालों को भूल जाए?आखिर क्यों न्यायपालिका भ्रष्टाचारियों को जमानत देकर उन्हें जेंटलमैन साबित करने पर तूली हुई है?
   देश को अब सीबीआई से भी कोई उम्मीद नहीं है।सीबीआई का तो बस एक ही काम रह गया है कि भ्रष्टाचारियों के जमानत के वक्त उसका विरोध करना।अगर सीबीआई सचमुच निष्पक्ष होकर काम करती तो आज ये लूटेरे जेल से बाहर नहीं होते।रिहाई तो उनकी होती है जो गलती से पकड़े जाते हैं।2जी घोटाले में शामिल कई ऐसे औद्योगिक घराने हैं जिन तक सीबीआई पहुँच भी नहीं पाई है।पटियाला हाउस कोर्ट का राजा को जमानत देने का फैसला सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बिल्कुल मेल नहीं खाता।जब सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाया था कि 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में नियमों को तोड़ा गया और देश की बहुमूल्य संपत्ति औने-पौने दामों में दे दी गई तो आखिर पटियाला हाउस कोर्ट 2जी घोटाले के मुख्य आरोपी को जमानत कैसे दे सकती है?सुप्रीम कोर्ट को देश को यह बताना चाहिए कि जब तत्कालीन टेलीकॉम मंत्री ए.राजा आरोपी नहीं हैं तो आखिर 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में हुई भारी गड़बड़ी का जिम्मेदार कौन है?सुप्रीम कोर्ट को 2जी घोटाले में रिहा हुए सभी आरोपियों की जमानत पर रोक लगानी चाहिए थी।जब सुप्रीम कोर्ट यह मान चुकी है कि 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में गड़बड़ी हुई थी तो आखिर उसके आरोपियों को जमानत किस आधार पर दी जा रही है?राष्ट्रभक्त जनता जवाब चाहती है।ए. राजा और कलमाड़ी जैसे भ्रष्टाचारियों को जमानत देकर न्यायपालिका ने साबित कर दिया कि आजकल कोई भी संस्था देशहित में काम नहीं कर रही।देश की नैया डूबाने में सभी का हाथ है।भ्रष्टाचारियों को लगातार जमानत देकर ये न्यायपालिका भ्रष्टाचारियों का मनोबल बढ़ा रही है।ये न्यायपालिका ही इन्हें खुली छूट दे रही है कि खुलकर देश को लूटो, बचाने के लिए हम तो हैं ही।
   हमारे पास केवल एक या दो उदाहरण ही नहीं हैं जिससे हम देश के कानून के खोखलेपन का अंदाजा लगा सकें बल्कि और भी कई उदाहरण हैं।पूर्व टेलीकॉम मंत्री सूखराम, जिनके घर से इतने सबूत बरामद हुए जो किसी भी व्यक्ति को भ्रष्टाचारी साबित करने के लिए काफी है।उन्हें भी कोर्ट ने यह कह कर जमानत दे दी कि अब इनकी उम्र हो चली है।कोर्ट अपने ही फैसलों से बड़ा ही हास्यास्पद दृश्य पैदा कर रही है जो कि सोचने पर मजबूर कर देती है कि अपने देश में कानून नाम की कोई चीज है या नहीं?कोई व्यक्ति खुलेआम अपनी महँगी गाड़ी से किसी को मौत के घाट उतार देता है और हमारा कानून उसका भी कुछ नहीं बिगाड़ पाता।उसे भी जमानत मिल जाती है।आखिर किस आधार पर न्यायपालिका उन्हें जमानत दे देती है?जिस रफ्तार से न्यायपालिका मुजरिमों को जमानत दिए जा रही है, लगता ही नहीं है कि जमानत कोर्ट में मिलती है।लगता है मानो जमानत बाजार में मिलती है और जिसे मन होता है खरीद लेता है।अगर हम राजनीतिक गलियारे में झांकें तो जिन्हें जेलों में होना था वो संसद में बैठे हैं।लालू यादव, जिन्हें जेल में होना चाहिए वो संसद में बैठकर हँसी-ठीठोली कर रहे हैं।कनिमोझी, जो देश के सबसे बड़े घोटाले में आरोपी थी, एक-दो बार पिताजी ने दिल्ली-दरबार में हाजिरी लगाई और 188 दिनों बाद रिहा होकर वो भी अब संसद में बैठी हैं।और अब राजा भी जेल से छूटकर नाचते हुए संसद में पहुँच ही चुके हैं।और भी कई ऐसे नाम हैं।सभी के नाम लिखने लगूं तो शायद सुबह से शाम एक ब्लॉग पोस्ट करने में ही लग जाए।
   मैंने ऊपर जो भी उदाहरण दिए, वो ये साबित करने के लिए काफी हैं कि अपने देश की कानून-व्यवस्था किस हद तक भ्रष्टाचारियों के आगे झुकी हुई है।धन और बाहुबल के आगे नतमस्तक हैं कानून के रखवाले।मैं सर्वोच्च न्यायालय से यह विनती करता हूँ कि आप जमानत की व्याख्या और उसका अर्थ देशवासियों को बताएँ।हर भ्रष्टाचारी को जमानत किस आधार पर दी जा रही है?राष्ट्र को ये बताएँ।अगर नहीं बता सकते तो इन जमानतों पर रोक लगाएँ।क्या न्यायपालिका अपने मन से किसी को भी जमानत दे सकती है?क्या अपने कानून में इतनी छूट मिली हुई है कि देशद्रोहियों को भी जमानत मिल जाती है?न्यायपालिका ये भूले न कि जिसे वो जमानत दे रही है वो उनके मुजरिम नहीं बल्कि राष्ट्र के मुजरिम हैं।सुप्रीम कोर्ट को राष्ट्रहित में आगे आकर इन भ्रष्टाचारियों की जमानत पर रोक लगानी चाहिए।आखिर जब भ्रष्टाचारियों को इस रफ्तार से जमानत मिलते रहेगी तो जनता का न्यायपालिका पर से भरोसा उठ जाएगा।आखिर कहाँ जाएगी देश की आम जनता?किससे न्याय की उम्मीद करेगी?ये ऐसे सवाल हैं जिनपर सर्वोच्च न्यायालय को गंभीरता से सोचना चाहिए।आज कानून पर से जनता का विश्वास डगमगा रहा है जिसकी दोषी सिर्फ और सिर्फ न्यायपालिका है।बड़े से बड़े अपराधी को भी कुछ नहीं हो रहा है जिसके जिम्मेदार न्यायपालिका है।2जी और सीडब्ल्यूजी जैसे देश के दो नामचीन घोटाले भी राजा और कलमाड़ी के जमानत के साथ ही दफन हो गए जिसकी जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ न्यायपालिका है।आज राजा सीना तान कर अपने समर्थकों के साथ संसद पहुँच चुके हैं जैसे कोई महान काम करके आ रहे हो।ये हमारे देश की कानून व्यवस्था पर जोरदार तमाचा है।किसी भी भ्रष्टाचारी को कुछ नहीं होता।सभी भ्रष्टाचारी सीना तान कर पहले राष्ट्र को लूटते हैं, फिर सीना तान कर जेल जाते हैं और फिर कानून के खोखलेपन का फायदा उठाकर सीना तान कर जेल से छूटकर संसद में बैठ जाते हैं।ये न्यायपालिका ही है जिसकी वजह से इस देश में 'राजा' और 'कलमाड़ी' जैसे लोग राजा बने हुए हैं।अगर न्यायपालिका राष्ट्रहित में निष्पक्ष होकर फैसले सुनाए तो इन भ्रष्टाचारियों की हँसी आँसू में बदल सकते हैं।अगर न्यायपालिका देश के बारे में सोचे तो इन भ्रष्टाचारियों को हम सबक सिखा सकते हैं।लेकिन जब न्यायपालिका ही राजा और कलमाड़ी को जमानत देकर राष्ट्रविरोधी फैसले दे रही है तो जनता आखिर ये उम्मीद कैसे कर सकती है कि भ्रष्टाचारियों को सजा मिलेगी।
   मैं अंत में जनता से यह कहना चाहता हूँ कि चूँकि अब भ्रष्टाचारी बाहर आ चुके हैं इसलिए अगला आम चुनाव लड़ने से तो इन्हें कोई रोक नहीं सकता।कानून के अदालत ने तो भ्रष्टाचारियों को न्याय देकर देश के साथ अन्याय कर दिया लेकिन तुम ऐसा मत करना।आखिर जब राजा जैसे लोग संसद में रहेंगे तो हम ये कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि जिस कानून के खोखलेपन का ये फायदा उठाते हैं उस कानून को ये मजबूत बनाएँगे।इन भ्रष्टाचारियों को संसद से उखाड़ फेंकने की जिम्मेदारी जनता की है।अगर ये भ्रष्टाचारी चुनाव लड़ेंगे तो यही जनता की परीक्षा होगी कि जनता किसका साथ देती है?राष्ट्र का या इन राष्ट्रद्रोहियों का?
जय हिंद! जय भारत!

  

Monday, 16 April 2012

क्या अपने देश में कानून सिर्फ आम आदमी के लिए ही है?

दोस्तों, अरविंद केजरीवाल ने हमारे कुछ माननीय सांसदों के बारे में सच्चाई क्या बोली, सभी सांसद उन पर टूट पड़े।पहले राजनीति प्रसाद और रामकृपाल यादव और अब केंद्रीय मंत्री वीरभद्र सिंह और जगदंबिका पाल ने उन्हें विशेषाधिकार हनन नोटिस भेजा है।टीम अन्ना के खिलाफ सदन के चर्चा में शरद यादव ने बड़े जोर-शोर से भाग लिया।लालू यादव ने तो उन्हें मेंटल केस तक कह दिया।
   मुझे समझ नहीं आता कि आखिर अरविंद केजरीवाल ने ऐसा क्या गलत कह दिया कि हर ओर से उनका विरोध हो रहा है?उन्होंने तो सिर्फ सच्चाई बोली है।ऐसा नहीं है कि इससे पहले कोई यह जानता नहीं था कि संसद में अपराधी भी जाते हैं।जानते सभी थे लेकिन बोलने की हिम्मत किसी ने नहीं दिखाई थी।अरविंद केजरीवाल ने हिम्मत दिखाई तो सभी उनके पीछे पड़े हैं कि वे संसद का अपमान कर रहे हैं।यह बड़ा दुखद है कि लोकसभा अध्यक्ष महोदय मीरा कुमार ने भी अरविंद केजरीवाल को फटकार लगाई और कहा कि भविष्य में संसद के बारे में इस तरह की अपमानजनक टिप्पणियाँ बर्दाश्त नहीं की जाएँगी।हर ओर बस 'संसद का अपमान' का ढोल बजा हुआ है।क्या लोकसभा अध्यक्ष महोदय इस बात को झूठा साबित कर सकती हैं कि हमारे देश की सर्वोच्च संस्था में भी अपराधी जाते हैं?जो लोग भी यह मानते हैं कि अरविंद केजरीवाल संसद का अपमान कर रहे हैं क्या वह अरविंद केजरीवाल की बातों को झूठला सकते हैं?नहीं, झूठला कोई नहीं सकते लेकिन 'संसद के अपमान' का ढोल सभी पीठ रहे हैं।
   गौरतलब है कि इस समय लोकसभा के 543 सदस्यों में से 162 सदस्यों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं।इन 162 में से 75 सदस्यों पर तो बेहद गंभीर मामले दर्ज हैं।कुछ सदस्यों के मामले में कहा जा सकता है कि उन पर जो मामले दर्ज हैं वे राजनीति से प्रेरित हैं।लेकिन इन 75 सांसदों का क्या?इन पर दर्ज बेहद ही गंभीर मामले तो बिल्कुल भी राजनीति से प्रेरित नहीं हो सकते।इन 75 सांसदों में से (जिनपर बेहद ही गंभीर मामले चल रहे हैं)13 कांग्रेस और 19 भाजपा से हैं।इन 162 आपराधिक मामलों वाले सदस्यों में 44 भाजपा और 42 कांग्रेस के हैं।अगर हम पिछले बार की तुलना में देखे तो इस बार लोकसभा में अपराधियों की संख्या में 17.2% की वृद्धि हुई है।पिछली बार जहाँ 128 लोकसभा सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज थे वहीं इस बार यह संख्या 162 हो गई है।तो क्या हम यह मान ले कि अगले बार लोकसभा में अपराधियों की बहुमत हो जाएगी?
   ये आँकड़े हमारे देश के लिए खतरे की घंटी है।ये आँकड़े हमारे देश की जनता की घटिया मानसिकता दर्शाने के लिए काफी हैं।आखिर क्या सोचकर वे इन अपराधियों को वोट दे देते हैं?सभी समान रूप से दोषी हैं।सबसे पहले दोषी हैं वे राजनीतिक पार्टियाँ जो इन अपराधियों को देश की सर्वोच्च संस्था का टिकट दे देती हैं।और उसके बाद दोषी है इस देश की जनता जो बिना सोचे-समझे इन अपराधियों को वोट भी दे देती है।ये आँकड़े राजनीतिक पार्टियों की पोल खोलने के लिए भी काफी हैं।इन आँकड़ों से यह साफ साबित होता है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी पाक-साफ नहीं है।हर राजनीतिक पार्टी में सिर्फ 'जाति और पैसा बोलता है'।भाजपा, जो कि खुद को राष्ट्रवादी पार्टी बताती है, क्या उसके पास जवाब है कि कैसे आपकी पार्टी से सबसे ज्यादा अपराधी सांसद हैं?जनता जवाब चाहती है कि आखिर इन राजनीतिक पार्टियों ने देश की सर्वोच्च संस्था के टिकट बँटवारे का क्या मापदंड बना रखा है जिसपर कि ये अपराधी भी खड़े उतर जाते हैं?वो जनता जवाब नहीं चाहती है जिनके आँखों पर जातिवाद की पट्टी बँधी है क्योंकि उस बेवकूफ़ जनता के सामने तो कितने भी बड़े अपराधी को खड़ा कर दो वो जाति के नाम पर वोट दे ही देगी, बल्कि वो जनता जवाब चाहती है जो सचमुच देश के बारे में थोड़ा भी सोचती है।हम अगर चाहे तो इन अपराधियों को वोट न देकर राजनीतिक पार्टियों की अक्ल ठिकाने लगा सकते हैं लेकिन हमने तो जैसे देश को बर्बाद करने की कसम खा रखी है।
   एक तरफ तो हमारे माननीय सांसद कोई ऐसा काम करते नहीं जिससे देश का भला हो और चाहते हैं कि सभी उनका सम्मान करे।तो क्या अब बंदूक की नोक पर लोगों के दिलों में सम्मान भरोगे?
   सभी राजनीतिक पार्टियाँ भ्रष्ट हैं।कोई भी आम जनता के लिए नहीं सोचता।सभी पार्टियाँ सिर्फ आम जनता का इस्तेमाल करती हैं और दुख की बात तो यह है कि हमारी आम जनता भी बेहद आसानी से मूर्ख बन जाती हैं।सभी राजनीतिक पार्टियों का एक ही सिद्धांत है 'लूटो और लूटने दो'।और ये सिद्धांत इन राजनीतिक पार्टियों को इतना प्यारा है कि उनके इस सिद्धांत के रास्ते में जो भी आता है उसकी बली चढ़ जाती है।
   जहाँ तक टीम अन्ना के द्वारा संसद के अपमान का सवाल है तो संसद के अपमान की तो कोई बात ही नहीं हुई।अरविंद केजरीवाल ने तो सिर्फ तथ्यों की जानकारी देकर जनता को जगाने की कोशिश की है।संसद का तो हम सभी सम्मान करते हैं।हम सभी उसे लोकतंत्र का मंदिर कहते हैं।लेकिन आज वह मंदिर अपवित्र हो चुका है जिसके दोषी भी हम खुद हैं और हमें ही मिलकर वापस संसद को पवित्र बनाना होगा।आखिर मंदिर की साफ-सफाई भी तो भक्त ही करते हैं उसी तरह अरविंद केजरीवाल ने लोकतंत्र के मंदिर की साफ-सफाई के लिए कोशिश की।संसद का अपमान करने के लिए पहले ही उसमें बैठे अपराधी कम हैं क्या जो किसी और पर संसद का अपमान करने का आरोप लगाते हो।मैं लोकसभा अध्यक्ष महोदय से पूछना चाहता हूँ कि क्या उस समय संसद का अपमान नहीं होता है जब ये राजनीतिक पार्टियाँ देश की सर्वोच्च संस्था के लिए अपराधियों को टिकट बाँट देती हैं?इस देश में तो हद हो रही है।अरविंद केजरीवाल जैसे एक (आम)आदमी सच्चाई बोलकर लोगों को जगाने की कोशिश करते हैं तो उन पर मुकदमे चल रहे हैं और ये राजनीतिक पार्टियाँ जो खुलेआम लोकतंत्र का मजाक बना रही है, इनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।आखिर इस देश में ऐसा क्यों है?क्या इस देश में सच्चाई बोलने की भी कोई सजा है?क्यों इस देश में कानून सिर्फ आम जनता के लिए ही है? मैं सुप्रीम कोर्ट से यह सवाल करना चाहता हूँ कि क्या इस देश की जनता यह उम्मीद नहीं कर सकती कि इन राजनीतिक पार्टियों पर भी कार्रवाई हो जो खुलेआम हमारे लोकतंत्र के मंदिर को गंदा कर रहे हैं?क्या इस देश के कानून में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जो इन अपराधियों को चुनाव लड़ने से रोक सके?आज तक संसद में इस बात पर चर्चा नहीं हुई कि संसद में अपराधी भी बैठे हैं।अरविंद केजरीवाल ने लोगों का ध्यान इस ओर खींचना चाहा तो ये सांसद जबर्दस्ती संसद के अपमान का ढोल पीटने लगे।चुकी टीम अन्ना ने राजनीतिक पार्टियों की पोल खोल दी तो इन पार्टियों ने दूसरा ही चर्चा छेड़ दिया ताकि अरविंद केजरीवाल द्वारा उठाया गया संवेदनशील मुद्दा दब जाए।क्या हमारी राजनीतिक पार्टियाँ देश को यह भरोसा नहीं दिला सकती थी कि आगे से वे किसी भी अपराधी को टिकट नहीं देंगे?हमारे माननीय सांसदों ने टीम अन्ना पर संसद में चर्चा छेड़ कर बड़ा ही हास्यास्पद दृश्य उत्पन्न कर दिया।टीम अन्ना तो संसद में चर्चा का कोई मुद्दा ही नहीं है, चर्चा का मुद्दा तो उनके द्वारा उठाया गया गंभीर मामला होना चाहिए।राशिद अल्वी ने कहा कि कानून बनाने का अधिकार सिर्फ सांसदों को ही है।अगर कानून सांसद बनाते हैं तो उनके लिए शर्म की बात होनी चाहिए कि उन्होंने कैसा कानून बनाया कि देश की सर्वोच्च संस्था के लिए भी अपराधियों को टिकट दे दिया जाता है।और दुख की बात तो ये है कि अगर कानून में त्रुटि है तो हमारे सांसद उसे दूर नहीं करना चाहते बल्कि अपनी गलती छुपा रहे हैं और दूसरों पर जबर्दस्ती कीचड़ उछाल रहे हैं।अगर संविधान ने सांसदों को कानून बनाने का अधिकार दिया है तो उसी संविधान ने हमें भी अपनी बात खुलकर कहने का अधिकार दिया है।लेकिन नहीं, हमारे सांसद सिर्फ अपने अधिकार को ही अधिकार मानते हैं, आम आदमी के अधिकार की तो किसी को परवाह ही नहीं है।लोकसभा अध्यक्ष महोदय ने जिस तरह से अरविंद केजरीवाल को फटकार लगाई, उससे तो यही पता चलता है कि हमारी सरकार चाहती है कि पूरा देश गाँधी जी के तीन बंदर बन जाएँ लेकिन दूसरे अर्थ में- 'सबकुछ देखो, सबकुछ सुनो लेकिन कुछ मत बोलो।यह सरकार संविधान द्वारा दिए गए हमारे अधिकारों को तोड़-मरोड़ रही है और हमें संविधान का पाठ पढ़ा रही है कि कानून बनाने का अधिकार सिर्फ उन्हें ही है।  
   क्या अब देश की यह हालत हो गई कि देश की इज्जत, मान-सम्मान संसद में बैठे 162 अपराधी तय करेंगे?टीम अन्ना की 'सच्चाई' पर जिस तरह से हमारे सांसदों ने प्रतिक्रिया दी उससे तो यही लगता है कि हमारे सांसद उन 162 अपराधियों की इज्जत को देश की इज्जत से जोड़कर देखते हैं।संसद का सम्मान तो सभी करते हैं लेकिन हम उन सांसदों का सम्मान कैसे कर सकते हैं जो अपराधियों की इज्जत को भी खुद के और संसद के इज्जत से जोड़कर देखते हैं?क्या अब इस देश में सांसदों की सच्चाई भी कोई नहीं बोल सकता?क्या संसद में पहुँच जाने पर लोगों के सभी पाप धूल जाते हैं?क्या संसद में पहुँच जाने पर कोई भगवान बन जाता है जिसपर कोई कुछ बोल भी नहीं सकता?अरविंद केजरीवाल ने बड़ा ही संवेदनशील मुद्दा उठाया जिसपर संसद में चर्चा होनी चाहिए और कानून बनना चाहिए कि आज के बाद कोई भी अपराधी चुनाव में खड़ा न हो सके लेकिन हमारे सांसदों ने हवा की दिशा को कहीं और ही मोड़ दिया।
   टीम अन्ना पर सवाल उठाने से पहले राजनीतिक पार्टियाँ अपने गिरेबान में झाँक कर देखे।संसद के लिए जिस तरह से खुलेआम अपराधियों को टिकट दिया जाता है वह इस बात का सबूत है कि हमारे देश के कानून में कितनी त्रुटि है और हमारी राजनीतिक पार्टियाँ उन त्रुटि को दूर करने की बजाए फायदा उठा रही हैं।लालू यादव और मुलायमसिंह यादव भी टीम अन्ना पर प्रहार कर रहे हैं।कम से कम उन्हें तो नहीं बोलना चाहिए।पूरा देश उनके बारे में सच्चाई जानता है, यह बात अलग है कि जातिवाद और धर्मवाद के नाम पर यूपी की जनता ने फिर से मुलायमसिंह यादव को हीरो बना दिया।जहाँ तक शरद यादव का सवाल है तो उन्होंने भी अपनी पहचान खुद ही खो दी।हर चोर जन लोकपाल का विरोध करते हैं जिसमें अब शरद यादव का भी नाम आ गया है।जब शरद यादव के बारे में टीम अन्ना ने 'चोर की दाढ़ी में तिनका' कह दिया तो वे भड़क उठे और अपनी ईमानदारी के किस्से सुनाने लगे।अगर सचमुच शरद यादव ईमानदार हैं तो आखिर उन्हें जन लोकपाल का विरोध करने की क्या जरूरत पड़ गई?टीम अन्ना ने कभी भी शरद यादव को चोर नहीं कहा लेकिन जब वे इस तरह से जन लोकपाल का विरोध करेंगे तो सभी के मन में सवाल उठेंगे कि आखिर आज तक एक ईमानदार नेता समझे जाने वाले शरद यादव जन लोकपाल का विरोध क्यों कर रहे हैं।शरद यादव ने अपनी ही बातों से अपनी पहचान इस कदर खो दी है कि अब इस देश की जो भी समझदार जनता है वो लालू, मुलायम, पासवान और शरद यादव में कोई अंतर नहीं समझेंगे।
   आखिर उस देश की कानून-व्यवस्था का क्या हाल होगा जहाँ कानून बनाने में 162 अपराधियों की भी भागीदारी है?अपराधियों से भरी संसद देश के उद्धार के बारे में कैसे सोच सकती है?मैं मतदाताओं से अपील करता हूँ कि अपराधियों को बिल्कुल वोट न दे।चाहो तो वोट ही न दो लेकिन अपराधियों को तो बिल्कुल भी वोट मत दो।इन राजनीतिक पार्टियों को सबक सिखाओ ताकि ये अपराधियों को टिकट देकर लोकतंत्र का मजाक न उड़ाएं।
जय हिन्द! जय भारत!     

Wednesday, 28 March 2012

गली गली चोर है!


दोस्तों, मैं यहाँ एक गाने की पंक्तियाँ पेश करने जा रहा हूँ जो फिल्म 'गली गली चोर है' का टाइटल ट्रैक है।इस गाने को स्वानंद किरकिरे ने लिखा है और म्यूजिक अनू मलिक ने दिया है।इस शानदार गाने को मशहूर गायक कैलाश खेर ने गाया है।यह गाना 'गली गली चोर है' सही मायनों में आज के भारत को बयां करता है।
गाना कुछ इस प्रकार है-

ये सब मन के भी हैं काले
ये सब धन के भी हैं काले
मेरे घर में ही रहते हैं मेरा घर लूटने वाले
जो चीज़ें जंगलों की हैं उन्हें जंगल में रहना था
वो अब दिल्ली में रहते हैं जिन्हें चम्बल में रहना था

गली गली चोर है, गली गली चोर है
करप्शन, करप्शन, करप्शन का शोर है
चोरों का जोर है, चोरों का जोर है
चोरों का दौर है, चोरों का दौर है
चोरों से बंधी हुई, चोरों की डोर है
गली गली चोर है, गली गली चोर है

करप्शन ने लिखी है सारी कहानी
बिना घूसखोरी न बिजली न पानी
यहाँ साँस लेने की कीमत लगेगी
घरों से निकलते ही रिश्वत लगेगी
यहाँ आम लोगों का है ये मुक़द्दर
न कुछ घर के बाहर न कुछ घर के अन्दर
न नेहरु का सपना सलामत रहा है
न गाँधी का चरखा सलामत रहा है
अदालत, कचहरी, ये वर्दी, ये थाने
चलाते हैं रिश्वत के सब कारखाने, सब कारखाने
दिशा कोई भी हो, लुटेरों का जोर है
गली गली चोर है, गली गली चोर है

ये टोपी ये धोती, ये कुरते पैजामे
सब इनके नाटक हैं, सब इनके ड्रामे
कोई इनसे कह दे गिरेबाँ में झांके
दुआ है कि खुल जाएँ दिल्ली की आँखें
लड़ाई अभी हमको रखनी है जारी
है आज़ादी अब तक अधूरी हमारी, अधूरी हमारी
सियासी लूटेरों का कैसा ये दौर है
गली गली चोर है, गली गली चोर है

उलझन है ये करप्शन
दुश्मन है ये करप्शन
अपनी अयोध्या में रावन है ये करप्शन
रेल की पटरिओं पे दौरे है ये करप्शन
सच्चाईओं के शीशे तोड़े है ये करप्शन
जाने कहाँ से आया
किसने इसे बुलाया
खेतों में अपनी आखिर ये ज़हर क्यों उगाया
कोई हकीम लाओ, कोई दवा पिलाओ
हाथ इसको बांधो, इस भुत को भगाओ

इन भ्रष्टाचारियोँ को, धन के पुजारिओं को
पकड़ के इनको जेल में डालो
देश को अपने इनसे बचालो-३

गली गली चोर है, गली गली चोर है
करप्शन, करप्शन, करप्शन का शोर है




 

Tuesday, 13 March 2012

ये पब्लिक है, जाति के सिवा कुछ नहीं जानती है!

दोस्तों, उत्तर-प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजे देखकर तो अच्छे-अच्छों के होश उड़ गए।06 मार्च को घोषित हुए नतीजों के अनुसार युपी में मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी साबित हुई।समाजवादी पार्टी ने 403 सीटों में 224 सीटों पर विजय हासिल करते हुए पूर्ण बहुमत हासिल किया।मायावती की बहुजन समाज पार्टी ने 80 सीटों पर विजय हासिल की और वह दूसरे नंबर पर रही।भाजपा 47 सीटों पर विजय हासिल करते हुए तीसरे नंबर पर रही, जबकि कांग्रेस और आरएलडी गठबंधन को 37 सीटों पर ही जीत नसीब हुई और वह चौथे नंबर पर रही।यूपी जैसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह यादव होंगे।पंजाब में अकाली दल-बीजेपी गठबंधन ने पूर्ण बहुमत हासिल किया और प्रकाश सिंह बादल एक बार फिर मुख्यमंत्री बनेंगे।गोआ में भाजपा ने कांग्रेस का सफाया करते हुए पूर्ण बहुमत हासिल किया।गोआ में श्री मनोहर पर्रिकर मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं।उत्तराखंड में कांग्रेस और भाजपा में से किसी ने भी पूर्ण बहुमत हासिल नहीं किया।70 सीटों में कांग्रेस को 32 सीटों पर जीत हासिल हुई, जबकि भाजपा को 31 सीटों पर जीत मिली।उत्तराखंड में कांग्रेस की सरकार बनना लगभग तय है।मणिपुर में कांग्रेस ने पूर्ण बहुमत हासिल किया और वहाँ उसकी सरकार बनना तय है।
   दोस्तों, पता नहीं यूपी की जनता को लैपटौप और टैब्लेट कंप्यूटर की कितनी ज्यादा जरूरत पड़ गई कि उन्होंने सपा जैसे 'घोषित' गूंडों और भ्रष्टाचारियों की पार्टी को पूर्ण बहुमत दिला दी।यूपी में सपा का जीतना यह साबित करता है कि यूपी की जनता जाति के सिवा कुछ नहीं जानती है।सिर्फ अपनी जाति और जिसे वोट देना है उनकी जाति आपस में मेल खानी चाहिए, उसके बाद तो जनता उस उम्मीदवार की झोली वोटों से भर देती है, चाहे वह कितना भी बड़ा अपराधी, लूटेरा क्यों न हो।यूपी की जनता आँखों वाली अंधी है कि मुलायम सिंह यादव जैसे 'मशहूर' भ्रष्टाचारी की पार्टी को जीत दिलवा दी।
   यूपी चुनाव में एक चीज तो ठीक रही कि कांग्रेस को जनता ने भाव नहीं दिया।लाख उपाय लगाए कांग्रेस ने कि किसी तरह यूपी में 22 वर्षों का उसका वनवास खत्म हो जाए।कभी मुस्लिमों को आरक्षण के नाम पर लुभाया तो कभी चुनाव आयोग से ही भीड़ गए।इतना सब करने के बावजूद भी जनता ने कांग्रेस और कांग्रेस के 'युवराज' को तनिक भी भाव नहीं दिया।जनता ने कांग्रेस के दिग्गजों और खासकर राहुल गाँधी को तो वापस दिल्ली जाने का रास्ता दिखला दिया पर जनता समाजवादी पार्टी से भी कहीं ज्यादा बेहतर विकल्प चुन सकती थी।मुलायम सिंह यादव की सपा को चुनना तो अपने पाँव पर खुद ही कुल्हारी मारने जैसा है।
   दोस्तों, अब मैं आपको इन चुनावों की एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात बताने जा रहा हूँ- पांच राज्यों में चुने गए विधायकों में से एक-तिहाई विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें सबसे अधिक उत्तर प्रदेश के एमएलए हैं। इन सूबों के कुल 690 विधायकों में से 35 प्रतिशत यानी 252 विधायकों केखिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। साल 2007 के मुकाबले यह 8% अधिक है।अगर हम यूपी की बात करें तो उत्तर प्रदेश में निर्वाचित 403 विधायक में से 189 यानी 47% के खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं। साल 2007 के मुकाबले 12% की वृद्धि है। इनमें से 98 के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। सबसे ज्यादा आपराधिक मामले वाले तीन विधायकों में हैं- समाजवादी पार्टी के बीकापुर से मित्रसेन यादव, जसराना से रामवीर सिंह और सकलडीहा के निर्दलीय सुशील सिंह। मित्रसेन पर 36 आपराधिक मामलेदर्ज हैं, जिनमें 14 हत्या से जुड़े हैं। सुशील के खिलाफ दर्ज 20 मामलों में 12 हत्या से जुड़े हैं। रामवीर के खिलाफ हत्या के 8 सहित 18 मामले दर्ज हैं। जिन 38 विधायकों पर हत्या के मामले चल रहे हैं, उनमें समाजवादी पार्टी के 18, बीजेपी के दो, बीएसपी के 5 और आठ निर्दलीय शामिल हैं।एक बात जानकर आपको और ज्यादा आश्चर्य होगा कि मुलायम सिंह ने इस बार जो उम्मीदवार खड़े किए थे उनमें 40% उम्मीदवारों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं।यह बात जानकर आपको सपा पर आश्चर्य नहीं होगा कि उसने खुलेआम अपराधियों को टिकट दिया, क्योंकि इस मामले में तो सपा को महारथ हासिल है।आश्चर्य अपने देश के कानून-व्यवस्था पर होता है कि यह कैसा कानून है कि कोई पार्टी खुलेआम अपराधियों को टिकट देती है और कानून सिर्फ तमाशा देखता है।क्या अपने देश में कानून सिर्फ आम लोगों के लिए ही है?वो अपराधी जो बेखौफ होकर चुनाव लड़ते हैं, कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाती; यहाँ तक कि चुनाव लड़ने से रोक भी नहीं पाती, सिर्फ इसलिए कि उन अपराधियों के सर पर बड़े-बड़े भ्रष्टाचारियों का हाथ होता है।आश्चर्य हमें उस जनता पर भी आता है कि क्या सोचकर वो इन अपराधियों को लोकतंत्र के मंदिरों में भेज देते हैं।क्या उन्हें इतनी भी समझ नहीं कि कम-से-कम किसी अपराधी को वोट न दें?क्या उनमें इतनी भी समझ नहीं कि समाज के लुटेरों को वोट न दें?धिक्कार है उन मतदाताओं पर जो इन अपराधियों को चुनकर भेज देते हैं लोकतंत्र के मंदिर में पाप की घंटी बजाने।यह जातिवाद राजनीति का ही कमाल है कि चुनावी मैदान में इतने अपराधियों को उतारने के बावजूद भी जनता ने जात-पात के नाम पर 'घोषित' गूंडों की पार्टी को पूर्ण बहुमत दिला दी।
   दोस्तों, सपा आखिर गूंडों की पार्टी ऐसे ही नहीं कही जाती।चुनाव के नतीजे आते ही सपा के गूंडे-कार्यकर्ताओं ने अपना परिचय देना शुरू कर दिया।कहीं जीत के जश्न में इतने डूब गए कि फायरिंग में एक मासूम बच्चे की जान ले ली, तो कहीं दूसरे पार्टियों से जीते उम्मीदवार से झड़प की।अभी नतीजे आए ज्यादा समय भी नहीं हुआ था कि सपा के मशहूर गूंडों ने जनता को अपना ट्रेलर दिखा दिया।जनता ने जैसी अयोग्य और गूंडों, भ्रष्टाचारियों की सरकार चुनी है, जनता नतीजे भुगतने के लिए तैयार रहे।अभी तो जनता ने सपा के गूंडों का सिर्फ ट्रेलर देखा है, पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त।अभी तो सरकार बनी भी नहीं है और इतना भयानक ट्रेलर तो जनता देख चुकी है, जनता घबराए नहीं क्योंकि सपा को पूरी पिक्चर दिखाने के लिए तो अभी पाँच साल पड़े हैं।
   दोस्तों, मैं अब जो आपको बताने जा रहा हूँ उसके बाद तो आपके होश उड़ जाएँगे।नवभारत टाइम्स नाम के मशहूर अखबार ने अपनी वेबसाइट पर इन विधानसभा चुनावों से पहले एक सर्वे करवाया था जिसमें वह अपने पाठकों को पाँचों राज्यों के कुछ नेताओं में से मुख्यमंत्री चुनने का विकल्प देता था।नवभारत टाइम्स के इस सर्वे में यूपी के कुछ चुनिंदा मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवारों में सर्वाधिक पाठकों ने उमा भारती को वोट दिया था।उनके आगे सभी फ़ीके पड़ गए थे।उन्हें 65% वोट प्राप्त हुए थे।और उनके बाद मायावती को पाठकों ने दूसरे नंबर पर रखा था।अखिलेश यादव जो अभी मुख्यमंत्री बनने वाले हैं, उन्हें तो मात्र 1% पाठकों ने वोट दिया।नवभारत टाइम्स के इन नतीजों से साफ है कि मुलायम और अखिलेश की पिता-पुत्र की पार्टी पढ़े-लिखे और समझदार लोगों की पसंद बिल्कुल भी नहीं है।अगर सपा पढ़े-लिखोँ की पसंद होती तो अखिलेश को 100% नहीं तो कम से कम 50% वोट भी तो आते।लेकिन नहीं उनमें तो सिर्फ 1% पाठकों ने ही मुख्यमंत्री बनने की आशंका जताई।सपा सिर्फ कम पढ़े-लिखे और जातीय समीकरण के आधार पर वोट देने वालों की ही पसंद है।सपा सिर्फ उनकी पसंद है जो वोट तो देते हैं लेकिन वोट की महत्ता को नहीं समझते।समझते हैं तो सिर्फ जाति की महत्ता।
   अखिलेश यादव को हर ओर से मुख्यमंत्री बनने की ढेरों बधाईयां आ रही हैं।हर कोई उन्हें शुभकामना दे रहा है कि वह राज्य अच्छे तरीके से चलाएँ।अगर अखिलेश यादव सचमुच एक अच्छे मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं तो उन्हें पहले अपने पार्टी के नेता, कार्यकर्ताओं पर नियंत्रण रखना चाहिए।अगर सपा के नेताओं में बदलाव नहीं आया तो मुझे नहीं लगता कि यूपी जैसा बड़ा राज्य अखिलेश ढंग से चला पाएँगे।और वैसे भी, जिस राज्य की विधानसभा में लगभग आधे विधायक दागी हैं, उस राज्य का आने वाले दिनों में क्या हाल होगा यह तो हम समझ ही सकते हैं।
   यूपी की जनता ने अपनी मूर्खता से आज राज्य को उस मोड़ पर खड़ा कर दिया है कि यूपी जैसा भारत का महत्वपूर्ण राज्य आज गूंडों के द्वारा चलने को मजबूर है।इसके दोषी मुलायम और अखिलेश नहीं हैं, इसकी दोषी सिर्फ जनता है।संविधान ने हमें इतना बड़ा अधिकार दिया कि हम अपनी सरकार खुद चुने और हम हैं कि जात-पात के नाम पर अपने राज्य और देश को गलत हाथों में सौंपकर बेड़ा गर्क कर रहे हैं।खैर, जिस जनता को राजनाथ सिंह और उमा भारती से ज्यादा भरोसा मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव पर हो, उस जनता का कुछ नहीं हो सकता।
   उत्तराखंड में पहली बार किसी मुख्यमंत्री ने एक सशक्त लोकायुक्त लाया और जनता ने उसे भी हरा दिया।बी.सी. खंडुरी जी जैसे ईमानदार नेता का हारना यह साबित करता है कि हमारे मतदाताओं को भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाला भी पसंद नहीं है।उन्हें पसंद है तो सिर्फ अपनी जाति के लोग फिर चाहे वह कितना भी बड़ा अपराधी क्यों न हो।  
   बिहार की जनता को देशभर में ऐसे ही बदनाम किया जाता है।आज एक मतदाता की हैसियत से बिहार की जनता देशभर में सर्वश्रेष्ठ है।कम से कम विकास के नाम पर हमारे श्री नीतिश कुमार को वोट तो देती है।पूरे देश की जनता को सीख लेनी चाहिए बिहार की जनता से।
   खैर यूपी चुनावों के नतीजों के बाद राज्य में एक बदलाव तो जरूर नजर आएगा- पिछले पाँच वर्षों से 'कोई' 'लूटती' थी, तो शायद अगले पाँच वर्षों तक 'कोई' 'लूटेगा'।   
             

Tuesday, 28 February 2012

रामदेव को मार, आतंकवादियों के लिए 'छलका' दुलार!देश के प्रति यह कैसा प्यार?

दोस्तों, जब हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने देश को अंग्रेजों से आजादी दिलाई थी, उस वक्त उन्होंने यह बिल्कुल नहीं सोचा होगा कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब अपने देश के नेता ही एक गंदी वोट-बैंक की राजनीति के तहत देश को तबाह करने वाले आतंकवादियों की खुशामद करेंगे और शहीदों का उपहास उड़ाएंगे।मुस्लिमों का वोट लेने के लिए हमारे कुछ नेताओं के लिए आतंकवादियों की खुशामद और शहीदों का उपहास तो जैसे दैनिक कार्यक्रम में शामिल है।इस कड़ी में एक उदाहरण है-बटला हाउस एनकाउंटर।
   19 सितंबर, 2008 को इंडियन मुजाहिदीन के आतंकवादियों का दिल्ली पुलिस ने एनकाउंटर किया था।यह एनकाउंटर बटला हाउस, जामिया नगर, नई दिल्ली में हुआ था जिसमें दिल्ली पुलिस ने दो आतंकवादियों को मार गिराया था, दो को गिरफ्तार किया था और एक आतंकवादी फरार हो गया था।इस पूरे एनकाउंटर का नेतृत्व किया था एनकाउंटर विशेषज्ञ और दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर श्री मोहन चंद शर्मा ने, जो कि इस घटना में शहीद हो गए।बस तभी से कुछ नेताओं ने इस एनकाउंटर पर भी मुस्लिम वोट-बैंक की गंदी राजनीति शुरू कर दी।कुछ नेताओं ने इस एनकाउंटर को फर्जी बताया।यहाँ तक कि गृह मंत्री के इस एनकाउंटर को सही ठहराने के बयान के बावजूद भी दिग्विजय सिंह जैसे कुछ नेता बाज नहीं आ रहे हैं और इस एनकाउंटर को लगातार फर्जी बता रहे हैं।समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी भी इस मुद्दे पर गंदी राजनीति करने से नहीं चुके और उन्होंने भी इस एनकाउंटर की न्यायिक जाँच की माँग की।केन्द्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने एक चुनावी रैली में बड़े गर्व से कहा कि बटला हाउस एनकाउंटर की तस्वीरें देखने के बाद सोनिया गाँधी के आँसू छलक आए।यह सब बातें बोलकर सलमान खुर्शीद और दिग्विजय सिंह जैसे नेता आखिर क्या साबित करना चाहते हैं?यही कि उनकी पार्टी मुस्लिमों की सबसे बड़ी शुभचिंतक है?ये सब राष्ट्र विरोधी और आतंकवाद समर्थित बातें बोलकर मुस्लिमों को क्या संदेश देना चाहते हैं?क्या यह संदेश देना चाहते हैं कि आप हमें वोट दे दो तो हम आतंकवादियों की भी खुशामद करेंगे?क्या ये नेता यह संदेश देना चाहते हैं कि आप हमें वोट दे दो तो हम शहीदों की शहादत की भी धज्जियां उड़ा देंगे?क्या ये नेता यह संदेश देना चाहते हैं कि हमारे लिए वोट सर्वोपरि है, चाहे वह वोट देश पर अपनी जान कुर्बान करने वाले शहीदों का अपमान करके ही क्यों न मिला हो।
   आतंकवादियों की मौत देखकर सोनिया गाँधी के आँसू छलक आए!क्या शहीदों की शहादत पर उनके आँसू नहीं आए?राहुल गाँधी पूरे उत्तर प्रदेश में विकास करने का ढोल पीट रहे हैं।राहुल जी! किसे बेवकूफ़ बना रहे हैं?आपके पार्टी के नेता रोज खुलेआम शहीदों का उपहास उड़ा रहे हैं और आप विकास की बातें कर रहे हैं!आपकी पूरी पार्टी को देशभक्ति का शुरूआती अक्षर 'द' भी नहीं पता है।जिसे राष्ट्र की इज्जत करना नही आता हो, जिसे शहीदों की देशभक्ति की भी कद्र नहीं हो, वह भला विकास क्या करेगा।आपकी पूरी पार्टी को पहले राष्ट्रवाद और देशभक्ति का पाठ पढ़ने की जरूरत है।     
   सोनिया जी! आपके आँसू उस वक्त कहाँ थे जब रामलीला मैदान में सोए हुए मासूम, निर्दोष लोगों पर पुलिस ने आधी रात को मानवता और इंसानियत की धज्जियां उड़ाते हुए, बेरहमी से लाठीचार्ज किया।अपने देश में सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि यहाँ के नेता हर एक चीज को वोट-बैंक से जोड़ देते हैं।हर एक काम, हर एक बयान देते हैं वोट-बैंक को ध्यान में रखते हुए।बाबा रामदेव जैसे देशभक्त और उनके समर्थकों को आधी रात को बेरहमी से पीटा गया क्योंकि बाबा में कांग्रेस को कोई वोट-बैंक नजर नहीं आया।जहाँ इन कांग्रेसी नेताओं को वोट-बैंक नजर आता है वहाँ पर तो ये नेता बिल्कुल नहीं चुकते हैं।चाहे उसके लिए इन नेताओं को अफ़जल और कसाब जैसे आतंकवादियों की फाँसी रोकवा कर इनकी खुशामद क्यों न करनी पड़े।अफ़जल और कसाब को फाँसी न देकर ये सरकार उन शहीदों का घोर अपमान कर रही है जिन्होंने एक पल भी यह नहीं सोचा कि उनके बाद उनके परिवार का क्या होगा और देश पर अपनी जान कुर्बान कर दी।सोचो कि अफ़जल जब संसद में बलास्ट करने वाला था उस वक्त वहाँ पर मौजूद जवानों ने कुर्बानी न दी होती तो हो सकता था कि आपमें से कोई नहीं बचता।उन जवानों ने आप नेताओं के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी और आपलोग हैं कि चंद वोटों के लिए उनकी मान-मर्यादा के साथ खिलवाड़ करते हैं।
   दोस्तों, जाटों के आंदोलन को तो आप जानते ही होंगे।न जाने कब से वो आरक्षण की माँग को लेकर रेलवे पटरी जाम करके आंदोलन करते आए हैं।वे तो आरक्षण की माँग करके देश को और ज्यादा खोखला करने की माँग करते हैं, फिर भी उन पर सरकार ने आज तक कोई कार्रवाई नहीं की क्योंकि उनमें सरकार को वोट-बैंक नजर आता है, उल्टा सरकार उनके सामने बेबसी ही दिखाती है।जबकि बाबा रामदेव अपने समर्थकों के साथ रामलीला मैदान में काले-धन, महँगाई और भ्रष्टाचार जैसे जनहित और देशहित मामलों पर शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन कर रहे थे, फिर भी उन पर और उनके समर्थकों पर बड़ी ही बेरहमी से पुलिस ने कार्रवाई की।पुलिस ने कारण बताया कि बाबा के आंदोलन की वजह से कानून व्यवस्था ढीली पड़ रही थी इसलिए उन्होंने कार्रवाई की।क्या जाटों के आंदोलन से कानून व्यवस्था नहीं गड़बड़ाती है जब उनकी बेकार माँग की वजह से कितनी ही रेलगाड़ियों को रद्द करना पड़ता है।यह नेताओं का वोट-बैंक ही है जिसकी वजह से देशहित का मामला उठाने वाले बाबा रामदेव और उनको समर्थकों को भी मार खानी पड़ी और देश को खोखला करने वाले आरक्षण की माँग करने वाले जाट अपनी मन-मर्जी के मुताबिक समय-समय पर रेल-पटरी जाम करते रहते हैं और रेलगाड़ियों को प्रभावित करते रहते हैं, जैसे यह सब उनकी नीजि संपत्ति हो।
   नेताओं को सोचने की जरूरत है कि अगर कभी कोई आतंकवादी किसी नेता के घर में घुस जाता है और उस वक्त पुलिस अगर यह कहकर टाल दे कि आपको मदद की क्या जरूरत है क्योंकि आपलोगों को तो इनकी मौत पर आँसू आ जाते हैं, तब आपका क्या होगा?  जरा सोचिए कि उस वक्त आपका क्या होगा जब आतंकवादी आपके घर में हो और पुलिस यह कह दे कि आपको मदद कि क्या जरूरत है, आपलोगों को तो हम जवानों से ज्यादा ये आतंकवादी ही प्यारे हैं।वैसे घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि ये जवान कभी ऐसा करेंगे नहीं।ये आपलोगों की तरह नहीं हैं।भले ही भ्रष्टाचार हर जगह है लेकिन आज भी इस भ्रष्टाचार के युग में भी ऐसे कुछ देश के जाँबाज सिपाही बचे हैं जिनका दिल देश के लिए धड़कता है।वैसे इन नेताओं का कोई भरोसा नहीं है।जैसी परिस्थिति मैंने कल्पना की है, उस परिस्थिति में अगर पुलिस अपनी जान की बाजी लगा कर इनकी जान भी बचा ले, तब भी ये नेता कहीं इस मुठभेड़ को भी फर्जी ही बताएँगे।
    कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने तो सारी हदें पार कर दी।खुलेआम शहीदों का मजाक उड़ाते हैं।बटला हाउस एनकाउंटर को फर्जी बताकर वो शहीद मोहन चंद शर्मा का तो मजाक बना ही रहे हैं।साथ-साथ वो पूरे पुलिस-फोर्स का मनोबल गिरा रहे हैं।आखिर वो भी तो सर्वप्रथम इस देश के नागरिक हैं।क्या उनकी अंतरात्मा उन्हें इस बात की अनुमति दे देती है कि आप देश के नागरिकों के लिए शहीद होने वाले जवानों का भी खुलेआम मजाक उड़ाएं?मेरे ख्याल से भारत के किसी भी सच्चे नागरिक को उनकी अंतरात्मा इस बात की अनुमति नहीं देगी।
   आखिर क्या हो गया है मुस्लिम समाज के बुद्धिजीवियों को?ये सरकार उन्हें वोट-बैंक की तरह इस्तेमाल कर रही है जिसके लिए रोज इस सरकार के नेता शहीदों की देशभक्ति के चिथड़े उड़ा रहे हैं।इतना सब होने के बावजूद भी वो क्यों चुप हैं?जो भी मुसलमान भाई खुद को इस देश का नागरिक मानते हैं उन्हें इस सरकार के खिलाफ आंदोलन छेड़ना चाहिए।आखिर उन्हें क्या समझा जा रहा है?कसाब और अफ़जल को फाँसी न देकर यह सरकार आतंकवादियों को आपका आदर्श बनाने पर तुली हुई है।आखिर आप अपना आदर्श किसे मानते हैं?इन आतंकवादियों को या भारत माता के सच्चे सेवक डॉ कलाम साहब को?फैसला आपको करना है।
   दोस्तों, हमारे देश के प्रधानमंत्री की मशहूर 'चुप्पी' से तो आप वाकिफ होंगे ही।इस गंभीर मुद्दे पर भी उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की।क्या प्रधानमंत्री होने के नाते उनका यह फर्ज नहीं बनता कि वह अपने सभी आतंकवाद समर्थित नेताओं को फटकार लगाएँ।खैर, जब तक वो हैं तब तक यह सोचना तो बेकार ही है कि वह गलती करने वाले अपने नेताओं को फटकार लगाएँ।जब डॉ मनमोहन सिंह ट्वीटर पर आए थे तो हर अखबार में यह चर्चा थी कि अब प्रधानमंत्री किसी मुद्दे पर अपनी चुप्पी नहीं रखेंगे और हर मुद्दे पर अपनी राय जाहिर करेंगे।लेकिन मुझे तो उनका ट्वीटर पर आने का कोई फायदा नजर नहीं आ रहा।अगर वह आतंकवाद जैसे संवेदनशील मुद्दे पर अपने कुछ नेताओं के बयानों पर प्रतिक्रिया भी नहीं दे सकते, तो उनका ट्वीटर पर रहना व्यर्थ है।
   इस सरकार ने सत्ता में रहने का अधिकार खो दिया है।आप ही बताइए कि कोई भी आतंकवाद समर्थित और राष्ट्र-विरोधी सरकार को सत्ता में रहने का अधिकार है?जिस तरह से यह सरकार मुस्लिमों को सिर्फ एक वोट-बैंक की तरह इस्तेमाल कर रही है, उसके बावजूद भी अगर मुस्लिम कांग्रेस को वोट देते हैं तो इसमें मुस्लिमों की ही ज्यादा गलती होगी। कांग्रेस खुलेआम आतंकवाद को बढ़ावा दे रही है, ऐसे में कांग्रेस को वोट देना तो आतंकवाद को समर्थन देना ही माना जाएगा।आप ही बताइए कि जहाँ आतंकवाद पूरी दुनिया में खतरा बना हुआ है, वहाँ अगर अपने देश की सत्ताधारी पार्टी ही आतंकवाद समर्थित बयान दे तो कैसे खत्म होगा आतंकवाद?
   पहले नेताओं को समाज का नेतृत्व माना जाता था लेकिन मैं आज के नेताओं को ऐसा नहीं मानता।आखिर समाज का नेतृत्व दिग्विजय सिंह और सलमान खुर्शीद जैसे नेता कैसे कर सकते हैं?जब समाज का नेतृत्व ही दिग्विजय सिंह जैसे आतंकवाद समर्थित नेता करेंगे तो बेड़ा गर्क तो होना ही है ऐसे समाज का।आज के समाज के हीरो शहीद मोहन चंद शर्मा, शहीद हेमंत करकरे और उनके जैसे और भी कई भारत माता के सच्चे सेवक हैं जोकि भारत माता पर आँच आने पर अपनी जान कुर्बान कर देते हैं।मुझे समझ नहीं आता कि कांग्रेस के नेताओं को सोनिया गाँधी में नेतृत्व क्षमता क्यों दिखाई देती है?जिन्हें आतंकवादियों की मौत पर आँसू आ जाए, वो भला देश का नेतृत्व क्या करेंगी।जिस भारत में बच्चों को विद्यालय से ही देश के जाँबाज स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में बताया जाता है, जिस भारत में वन्दे-मात्रम सुनते ही बच्चों की आँखों में आँसू आ जाते हैं, उस भारत में दिग्विजय सिंह, सलमान खुर्शीद और सोनिया गाँधी जैसे नेता आखिर समाज को क्या संदेश देंगे?क्या यह संदेश देंगे कि देश के शहीदों पर नहीं बल्कि आतंकवादियों के एनकाउंटर पर आँसू बहाओ?मेरी जनता से यह गुजारिश है कि जो भी नेता शहीदों का मजाक उड़ाएं, उन्हें अच्छी तरह से पहचान लो।उन नेताओं को आने वाले लोकसभा चुनाव में बिल्कुल वोट मत देना।उन्हें कोई अधिकार नहीं है शहीदों का अपमान करके संसद में जाने का।शहीदों का अपमान करने वाले एक-एक नेताओं को सबक सिखाओ।भारत माता के सच्चे सेवकों का जिन-जिन नेताओं ने मजाक उड़ाया है उन्हें कतई वोट मत देना।जो भी खुद को भारत के सच्चे नागरिक मानते हैं, वो कांग्रेस को कभी वोट नहीं देंगे।जिनमें भारत माता के प्रति थोड़ी भी आस्था होगी, वो कांग्रेस को कभी वोट नहीं देंगे।देश को कोई जरूरत नहीं है ऐसे नेताओं कि जो शहीदों का सम्मान करना भी नहीं जानते हो।उन सभी नेताओं पर मुकदमा चलना चाहिए जिन्होंने खुलेआम शहीदों का अपमान करके उनकी देशभक्ति की भावना को ठेस पहुँचाई है।अत: मैं आप सभी से गुजारिश करता हूँ कि अगर अपने देश का भला चाहते हैं तो कांग्रेस को कभी वोट मत देना।कांग्रेस ने शहीदों के साथ-साथ भारत माता के प्रति उनकी मर-मिटने की भावना को भी चोट पहुँचाई है, जिसकी सजा उसे मिलनी चाहिए।आइए हम सब कांग्रेस को वोट न देकर शहीदों को नमन करें और भारत माता की जयजयकार करें।वे (शहीद) हमारे दिलों में हमेशा जिंदा रहेंगे और हमें हमेशा देशभक्ति का पाठ पढ़ाते रहेंगे।
जय हिंद! जय भारत!           


         

Wednesday, 15 February 2012

गंदी राजनीति संवैधानिक संस्था पर भारी!

दोस्तों, रिकॉर्ड तो रिकॉर्ड होता है।रिकॉर्ड चाहे सबसे ज्यादा रन बनाने का हो या सबसे अधिक बार शून्य पर आउट होने का, रिकॉर्ड बनाने वाले पर तो सभी की निगाहें रहती ही हैं।फिर चाहे रिकॉर्ड देश के इतिहास में पहली बार किसी कानून मंत्री का कानून के उल्लंघन का ही क्यों न हो।आखिर रिकॉर्ड तो रिकॉर्ड होता है।
   अब तो आप समझ ही गए होंगे कि मैं किसकी बात कर रहा हूँ।जी हाँ, मैं कानून मंत्री सलमान खुर्शीद की ही बात कर रहा हूँ।एक तो पहले ही वह मुस्लिमों को ओबीसी के 27% कोटे के तहत 9% सब-कोटा देने का वादा कर चुनाव आचार संहिता उल्लंघन के दोषी पाए गए थे, जो कि किसी भी कानून मंत्री के लिए शर्म की बात है।उसके बाद अपने उस बयान पर अफसोस जताने के बजाए आज़मगढ़ में एक चुनावी रैली के दौरान उन्होंने फिर से अपना वही वादा दोहरा दिया।इस बार तो उन्होंने हद ही कर दी।इस बार उन्होंने एक कदम आगे बढ़ते हुए चुनाव आयोग को खुली चुनौती दे डाली।उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग चाहे उन्हें फाँसी पर लटका दे पर वह मुस्लिमों को उनका हक दिला कर रहेंगे।शायद कानून मंत्री भूल गए थे कि चुनाव आयोग ने उन पर शौक से कार्रवाई नहीं की थी, बल्कि वो चुनाव आचार संहिता उल्लंघन के दोषी पाए गए थे।फिर भी अफसोस जाहिर करने के बजाए कानून मंत्री एक गंदी राजनीति के तहत मुस्लिमों का वोट लेने के लिए चुनाव आयोग को ही चुनौती दे बैठे।यह देश में पहला मौका है जब कोई कानून मंत्री ही कानून पर लात मार रहा है, कानून को चुनौती दे रहा है।कानून मंत्री के मुँह से ऐसी बातें बिल्कुल ही अशोभनीय हैं।वह कानून मंत्री हैं तो क्या हुआ।क्या वह कानून से ऊपर हैं?
   खैर, मंत्रीजी के बयानों को देखते हुए, एक बात तो देखने को मिली कि आज अपने देश में जातिवाद और धर्म-आधारित गंदी राजनीति चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्था पर भी भारी है।गौरतलब है कि इससे पहले भी सलमान खुर्शीद चुनाव आयोग को हद में रहने कि हिदायत दे चुके हैं।उन्होंने कहा था कि सभी संस्था सरकार के ही निगरानी में चलती हैं और चुनाव आयोग भी कोई अपवाद नहीं है।माना कि सभी संस्था सरकार के ही मातहत काम करती हैं लेकिन अगर एक कानून मंत्री खुलेआम किसी संवैधानिक संस्था को चुनौती दे डाले तब तो संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता खतरे में आ जाएगी।
   चुनाव आयोग को कानून मंत्री पर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए थी ताकि फिर कभी कोई मंत्री किसी संवैधानिक संस्था की स्वायत्तता को चोट न पहुँचाए।लेकिन चुनाव आयोग का ढीला रवैया देखकर तो लगता है कि संवैधानिक संस्थाओं का वजूद ही खतरे में है।आखिर कहाँ गुम हो गया वो चुनाव आयोग जो कभी टी. एन. शेषन के वक्त हुआ करता था?आज संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता खतरे में है और आज देश को दूसरे टी.एन. शेषन की जरूरत है, जोकि संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता बरकरार रख सके।
   राहुल गाँधी हर जगह संवैधानिक लोकपाल का ढोल पीटते चलते हैं।जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि उनका यह विचार तो अच्छा है पर कानून मंत्री का रवैया देखकर तो आपका यह विचार हास्यास्पद लगता है।आज आपके कानून मंत्री ने चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्था को चुनौती दे डाली, कल को आपका कोई मंत्री संवैधानिक लोकपाल को भी चुनौती दे डालेगा।राहुल जी! पहले यह तो सुनिश्चित कर लीजिए कि आपके कानून मंत्री संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता के बारे में जानते भी हैं या नहीं, वरना आपका यह विचार व्यर्थ है।
   इस गंभीर मुद्दे पर आखिर कांग्रेस के दो 'स्टार प्रवक्ता', दिग्विजय सिंह और कपिल सिब्बल कहाँ चुप रहने वाले थे।दिग्विजय सिंह ने कहा कि सलमान खुर्शीद ने कुछ गलत नहीं कहा बल्कि उन्होंने वही कहा जो कांग्रेस की चुनावी रणनीति का हिस्सा है, कांग्रेस के चुनावी घोषणापत्र में भी मुस्लिम आरक्षण वाली बात लिखी है।माना कि कांग्रेस के घोषणापत्र में मुस्लिम आरक्षण वाली बात लिखी है लेकिन जब सलमान खुर्शीद को चुनाव आचार संहिता उल्लंघन के मामले में फटकार लगाई गई उसके बाद तो उन्हें वह बात नहीं दोहरानी चाहिए थी।जिस तरह से सलमान खुर्शीद ने पूरे आत्मविश्वास के साथ खुलेआम धर्म-आधारित गंदी राजनीति के तहत चुनाव आयोग को चुनौती दे डाली, क्या वह भी कांग्रेस की चुनावी रणनीति का हिस्सा है?क्या वह भी कांग्रेस के चुनावी घोषणापत्र में लिखा है?कपिल सिब्बल ने कहा कि खुर्शीद ने जो भी बोला है वो सोच-समझकर बोला है।जी हाँ, बिल्कुल ठीक कहा आपने सिब्बल जी।कौन सा मुस्लिम आबादी वाला क्षेत्र है, कहाँ जाकर धर्म-आधारित गंदी राजनीति के तहत मुस्लिमों को आरक्षण का लालच देकर उनका वोट लूटना है?यह सब कोई बिना सोचे-समझे कैसे कर सकता है!
   कांग्रेस पार्टी शुरू से ही खुद को कानून मंत्री के बयानों से अलग करती नजर आई।जब खुर्शीद ने अपनी पत्नी की चुनावी रैली में मुस्लिम आरक्षण की बात कही थी तब कांग्रेस ने कहा था कि आरक्षण का वादा उनकी निजी राय है न कि पार्टी की।वाह! बहुत खूब।आपका कानून मंत्री मुस्लिमों को 9% सब-कोटा देने की बात कर रहा है और आप कहते हैं कि यह उनकी निजी राय है।किसी खास धर्म को आरक्षण देने ऐसा बड़ा फैसला क्या निजी हो सकता है?क्या कानून मंत्री मुस्लिमों को निजी तौर पर आरक्षण देंगे?कांग्रेस अपने इस बयान से क्या साबित करना चाहती है ?यही कि देश कानून मंत्री की निजी संपत्ति है और वह जिसे चाहे उसे निजी तौर पर आरक्षण दे देंगे?कांग्रेस के गैरजिम्मेदाराना बयान से तो ऐसा ही लगता है।इस बार भी जब चुनाव आयोग ने खुर्शीद की शिकायत करते हुए राष्ट्रपति को पत्र लिखा(जोकि राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री कार्यालय में कार्रवाई के लिए भेज दिया), तब कांग्रेस के राज्यसभा सांसद जनार्दन द्विवेदी और वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा कि सलमान खुर्शीद ने ठीक नहीं किया।उन्होंने यह भी कहा कि जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्तियों को जिम्मेदारी से काम करना चाहिए।यह बात आपलोग किसे सुना रहे हैं? अगर देश की जनता को सुना रहे हैं तो पहले जाकर अपने कानून मंत्री को समझाईए जो चुनाव आचार संहिता उल्लंघन के दोषी पाए जाने के बावजूद भी अफसोस जाहिर करने के बजाए कानून को ही चुनौती दे रहे हैं।कांग्रेस ने भी क्या चुनावी दाँव खेला है!बहुत खूब।एक तरफ तो सलमान खुर्शीद के माध्यम से मुस्लिमों को 9% सब-कोटा देने का वादा कर एक गंदी राजनीतिक दाँव खेली है और फिर इस मामले से पार्टी को अलग करके देश को बेवकूफ़ बना रहे हैं।
   अंततः सलमान खुर्शीद ने चुनाव आयोग से माफी माँग ली है।उन्होंने कहा कि इस पूरे मामले पर उन्हें अफसोस है और भविष्य में वह ऐसा नहीं करेंगे।उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव आयोग के फैसलों की अवहेलना करना उनका मकसद नहीं था और वह चुनाव आयोग के फैसलों का सम्मान करते हैं।वाह! खुर्शीद साहब सम्मान देने का आपका क्या तरीका है!भरी सभा में चुनाव आयोग को ललकारते हैं और फिर कहते हैं कि चुनाव आयोग का सम्मान करते हैं।जब एक बार आपको चुनाव आयोग ने चुनाव आचार संहिता उल्लंघन के मामले में फटकार लगाई उसके बाद आपने फिर वही गंदी राजनीतिक दाँव चली, उस वक्त आपका यह सम्मान कहाँ था।माना कि एक बार आपसे गलती हो गई लेकिन फिर दोबारा जानबूझकर वही बातें दोहराना तो गलती नहीं समझी जाएगी।आपने माफी माँगी क्योंकि आपने सोचा होगा कि मुस्लिम आरक्षण का दाँव तो आप दो मर्तबा चल ही चुके हैं, मुस्लिमों को दो चुनावी सभाओं में बेवकूफ़ बना ही चुके हैं इसलिए अब माफी माँगने में क्या हर्ज है।आपने चुनाव आयोग से माफी तो माँगी एक पत्र लिखकर लेकिन चुनाव आयोग की खिल्ली उड़ाई थी भरी रैली में।अगर सचमुच आपको अपने बयानों पर अफसोस है तो फिर से किसी चुनावी रैली में जनता के सामने चुनाव आयोग से माफी मांगिए।जिस तरह से आपने जनता के सामने खुलेआम एक गंदी राजनीति के तहत चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्था की स्वायत्तता को चोट पहुँचाई थी, उसी तरह जनता के सामने कहिए कि आप और आपके बयान गलत थे और चुनाव आयोग सही था।जनता के सामने कहिए कि आप चुनाव आयोग का सम्मान करते हैं और भविष्य में चुनाव आयोग के निर्देशों की अवहेलना नहीं करेंगे।मैं यह सब कानून मंत्री को अपमानित करने के लिए नहीं कह रहा हूँ बल्कि इसलिए कह रहा हूँ कि अगर सचमुच उन्हें अपनी गलती का अहसास है तो उन्हें अपनी गलती जनता के सामने स्वीकारनी चाहिए।यह पूरा मामला उन्होंने जनता के सामने शुरू किया था तो इसे खत्म करने की पहल भी वो जनता के सामने ही करें।अगर वो जनता के सामने चुनाव आयोग की खुलेआम खिल्ली उड़ा सकते हैं तो उसी जनता के सामने अपनी गलती क्यों नहीं मान सकते?   
  

Tuesday, 7 February 2012

उफ़्फ़.........ये चुनावी वादे!


दोस्तों, जैसा कि आप सब जानते हैं, इस साल के शुरूआत में पाँच राज्यों में विधान-सभा चुनाव होने वाले हैं।जनवरी के अंत(28 जनवरी) से मणिपुर से इन चुनावों की शुरूआत हो चुकी है और पंजाब और उत्तराखंड(30 जनवरी) में भी वोट डालने की प्रक्रिया हो चुकी है।उत्तर-प्रदेश में सात-चरण में मतदान होने हैं जिनकी शुरूआत 8 फरवरी से होगी और आखिरी मतदान 3 मार्च को होंगे।गोआ में 3 मार्च को चुनाव होने हैं।इन सभी पाँच राज्यों के वोटों की गिनती 6 मार्च को होगी।यूं तो राजनीतिक नजरिए से हर राज्य अहम होता है लेकिन इस बार इन पाँच राज्यों में सबसे दिलचस्प मुकाबला उत्तर-प्रदेश में है, जहाँ सभी राजनीतिक पार्टियाँ वोटरों को लुभाने के लिए वादे पर वादे किए जा रही हैं।कोई सत्ता में आने के बाद विकास करने की बात कर रहे हैं तो कोई छात्रों को मुफ्त लैपटौप एवं टैबलेट कंप्यूटर देने का वादा कर रहा है।कोई सर्वजन-हिताय की बात कर रहा है तो कोई मुस्लिमों को ओबीसी कोटे के तहत आरक्षण का सब-कोटा दोगुना करने के वादे कर रहा है।वादा चाहे कोई भी हो पर सभी का लक्ष्य है मतदाताओं को लुभाना।
   जिन लोगों का आम जनता से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं रहता है, चुनाव के दौरान वे भी जनता के बीच उतर जाते हैं जैसे जनता के सबसे शुभचिंतक वही हो।राहुल गाँधी ने उमा भारती से कहा कि जब यूपी में किसानों पर अत्याचार हो रहा था उस वक्त वो नहीं आई और अब चुनाव के वक्त जनता के बीच आ गई।सवाल तो आपसे भी पूछा जा सकता है राहुल जी!आपकी बहन प्रियंका जी भी तो किसानों को अत्याचार से बचाने नहीं आई थी पर अब जैसे ही चुनाव आए तो वो मैदान में कूद पड़ीं।
   किसी भी राजनीतिक पार्टी का जब गठन हुआ था तो उस वक्त उसके कुछ सिद्धांत हुआ करते थे।लेकिन आज-कल तो ये सिद्धांत बिल्कुल गायब हैं।चुनाव के दौरान पार्टियाँ वोटों के लालच में अपने सिद्धांत भी भूल जाती हैं।अखबारों में इस तरह की खबरें आम हो गई हैं, जैसे- कांग्रेस ने मुस्लिमों का सब-कोटा बढ़ाने का वादा कर उन्हें लुभाने की कोशिश की, भाजपा ने मुस्लिम आरक्षण का विरोध कर पिछड़ों पर पकड़ मजबूत की, मायावती की दलित वोट-बैंक पर नजर।इन खबरों से तो ऐसा ही लगता है कि सभी पार्टियों ने अपने सिद्धांत भूला कर जातिवाद और धर्म-आधारित राजनीति अपना लिया है।क्या भारतीय समाज में अब इस तरह की घटिया राजनीति स्वीकार्य हो चुकी है?सभी खुलेआम जात-पात की राजनीति कर रहे हैं।तो क्या अब हमारे देश में विकास की राजनीति पर जात-पात की राजनीति हावी है?यूपी विधान-सभा चुनाव में नेता खुलेआम मतदाताओं को जात-पात के नाम पर बेवकुफ़ बना रहे हैं।फिर भी जनता अगर सचमुच आकर्षित होकर जात-पात के नाम पर वोट दे तो यह तो जनता की ही गलती होगी।सपा ने सत्ता में आने के बाद छात्रों को मुफ्त लैपटौप एवं टैबलेट देने का वादा किया।यह तो खुलेआम जनता को रिश्वत देना है।आप विकास की बात नहीं कर रहे हैं और खुलेआम रिश्वत को बढ़ावा दे रहे हैं।इस तरह के वादों को भी चुनाव आचार संहिता उल्लंघन के तहत लाना चाहिए।भाजपा ने अल्पसंख्यक कल्याण की बात कही तो दिग्विजय सिंह ने कहा कि चाहे कोई भी अल्पसंख्यक कल्याण की बात करे लेकिन सत्ता में रहने की वजह से मुस्लिमों को आरक्षण तो कांग्रेस ही दिला सकती है।यह तो हद हो गई।कांग्रेस खुलेआम मुस्लिमों को कह रही है कि आप हमें वोट दो, हम आपको आरक्षण देंगे।
   राहुल गाँधी शुरू से यह कहते आएं हैं कि उन्होंने चुनाव आयोग की तरह एक संवैधानिक लोकपाल की जो बात कही थी, तो सभी विपक्षी नेताओं ने उनका मजाक उड़ाया।अरे! राहुल जी लोकपाल पर सरकार के रवैये को देखकर तो तो कोई भी मजाक उड़ायगा।सरकार ने एक बेअसर लोकपाल लाकर जनता के सामने पेश किया और आप उसे संवैधानिक दर्जा देने की बात कर रहे हैं।एक ऐसा लोकपाल जो कि स्वतंत्र रूप से जाँच भी नहीं कर सकता क्योंकि उसे जाँच के लिए सीबीआई को सिफारिश भेजनी होगी, उसे आप संवैधानिक दर्जा देने की बात कर रहे हैं।आपका यह विचार तो खुद ही एक मजाक है।माना कि लोकपाल को संवैधानिक दर्जा मिलने से वह चुनाव आयोग की तरह बिना सरकार की दखलअंदाजी के काम करेगा लेकिन उसके लिए एक मजबूत लोकपाल चाहिए।एक संवैधानिक लोकपाल का राहुल जी का विचार स्वागत योग्य है लेकिन पहले एक मजबूत लोकपाल को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।टीम अन्ना की सदस्य मेधा पाटकर ने भी एक संवैधानिक लोकपाल का समर्थन किया लेकिन जैसा मजबूर लोकपाल सरकार ने पेश किया उसके बाद तो कोई भी राहुल गाँधी के संवैधानिक लोकपाल के विचार का मजाक उड़ायगा।जब सरकार के पास मौका था एक मजबूत लोकपाल लाने का तब तो सरकार ने लाया नहीं और अब चुनाव के वक्त वोट लेने के लिए राहुल जी जनता से कह रहे हैं कि कांग्रेस एक मजबूत लोकपाल लाएगी।प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने भी जनता से एक मजबूत लोकपाल लाने का वादा किया।महोदय, आपका यह वादा तो कई महीनों से सुनते आ रहे हैं, वादा निभाईएगा कब?जब एक मजबूत लोकपाल की माँग उठी तो किस तरह से आपकी पूरी सरकार ने मिलकर लोकपाल की 'हत्या' कर दी, यह पूरे देश ने देखा।भ्रष्टाचार मिटाने में आपकी पूरी सरकार बुरी तरह से विफल रही है और आप चुनाव के वक्त मजबूत लोकपाल का वादा करके जनता को दिखा रहे हैं कि आपकी सरकार भ्रष्टाचार मिटाना चाहती है।आपकी सरकार मजबूत लोकपाल का वादा करके किसे बेवकूफ़ बना रही है?क्या उस जनता को जिसने अपनी आँखों से आपके सरकार की सच्चाई देखी कि किस तरह से सरकार ने एक 'मजबूत' लोकपाल से डर कर जनता के सामने एक 'मजबूर' लोकपाल पेश किया।भ्रष्टाचार मिटाने के प्रति सरकार का इतना नकारात्मक रवैया देखने के बावजूद भी अगर जनता ने कांग्रेस को किसी भी चुनाव में वोट दिया तो देश में ऐसी जनता का होना तो देश का दुर्भाग्य ही कहलाएगा।
   मैं मतदाताओं से कहना चाहता हूँ कि उठो, जागो और देखो कि देश में क्या हो रहा है।देखो,पहचानो कि कौन देशहित में काम कर रहा है और कौन देश को डूबा रहा है।अपना बहुमूल्य वोट किसी नेता की मीठी बातों में आकर बर्बाद मत करो।जब तक आपलोग जात-पात के नाम पर वोट देते रहेंगे तब तक जातिवाद राजनीति जिंदा रहेगी।नेता तो कभी जात-पात की राजनीति करना छोड़ेंगे नहीं, आपलोग इस देश के नागरिक होने के नाते जातिवाद राजनीति खा बहिष्कार कीजिए।कोई भी नेता जो किसी खास समाज के कल्याण की बात करे उसे तो बिल्कुल वोट मत दीजिए।जो पूरे राज्य, देश का विकास करे उसे ही अपना वोट दें।नेताओं का आचरण, व्यक्तित्व देखकर उन्हें वोट दें, उनकी जाति या धर्म देखकर नहीं।
जय हिंद! जय भारत!  
              
           

Sunday, 29 January 2012

सीनियर्स के संन्यास लेने की माँग........ अपरिपक्वता की निशानी।

दोस्तों, टीम इंडिया के इंग्लैंड दौरे के जख्म अभी भरे भी नहीं थे कि टीम इंडिया ने क्रिकेट प्रेमियों को एक और जख्म दे दिया।पिछले इंग्लैंड दौरे पर तो टीम एक भी मैच जिते बिना ही देश लौट आई थी।4 टेस्ट, 1 टी-ट्वेंटी और 5 वन-डे की सीरिज में टीम एक भी मैच जितने में असफल रही थी।और उस खराब प्रदर्शन के कारण टीम को टेस्ट मैचों में नंबर एक का ताज भी गंवाना पड़ा।ठीक उसी तरह की स्थिति अभी टीम इंडिया की ऑस्ट्रेलिया में भी है।4 टेस्ट मैचों की सीरिज में तो टीम का सफाया हो ही चुका है और अगर टीम के खिलाड़ियों ने प्रदर्शन में सुधार नहीं किया तो वो दिन भी दूर नहीं जब टीम को ऑस्ट्रेलिया से भी खाली हाथ लौटना पड़ेगा।टीम को अभी ऑस्ट्रेलिया से दो टी- ट्वेंटी मैचों की सीरिज और एक त्रिकोणीय सीरिज भी खेलनी है जिसकी तीसरी टीम श्रीलंका है।अगर टीम को ऑस्ट्रेलिया में अपनी लाज बचानी है तो आने वाले मैचों में निश्चित रूप से अच्छा प्रदर्शन करना होगा।
   टीम के ऑस्ट्रेलियाई दौरे में खराब प्रदर्शन पर सबसे ज्यादा आलोचना झेलना पड़ा सचिन, द्रविड़, लक्ष्मण सरीखे त्रिदेव और कप्तान धोनी को।माना कि खराब दौर से तो सभी टीमों और कप्तानों को गुजरना पड़ता है लेकिन पिछले दो विदेशी दौरों पर टीम का प्रदर्शन सचमुच निराशाजनक रहा है।इस खराब प्रदर्शन के लिए किसी दो या तीन खिलाड़ी को जिम्मेदार ठहराना बिल्कुल गलत है।खासकर त्रिदेव और कप्तान धोनी पर ही सारा दोष डालना तो बेमानी होगी।पूरी टीम अगर एकजुट होकर अच्छा प्रदर्शन करती है तभी किसी टीम को जीत मिलती है, किसी एक या दो खिलाड़ियों के ही अच्छा प्रदर्शन कर लेने से टीम नहीं जीतती है।उसी तरह अगर टीम हारती भी है तो उसकी ज़िम्मेवार पूरी टीम है, न कि एक या दो खिलाड़ी।हाँ, यह बात अलग है कि जब टीम जीतती है तो अच्छा प्रदर्शन तो टीम के सभी खिलाड़ी करते हैं लेकिन सबसे ज्यादा क्रेडिट ले उड़ते हैं टीम के कप्तान।और इस बार जब टीम इंडिया लगातार दूसरे विदेशी दौरे पर टेस्ट मैचों में वाइटवाश हो चुकी है तो इसकी जिम्मेदार तो पूरी टीम है लेकिन एक कप्तान के रूप में सबसे ज्यादा जिम्मेदार धोनी ही हैं, जो उन्होंने स्वीकारी भी है।
   पहले इंग्लैंड और फिर ऑस्ट्रेलियाई दौरे पर टीम के शर्मनाक प्रदर्शन के बाद धोनी को टेस्ट टीम की कप्तानी से हटाने की माँग तेज हो गई।कपिल देव और सुनील गावस्कर सरीखे क्रिकेट के दिग्गजों ने भी धोनी को कप्तानी से हटाने की बात कही।अगर क्रिकेट बोर्ड धोनी को टेस्ट टीम के कप्तानी से हटा भी देती है तो वैसे भी टीम के खराब प्रदर्शन के बाद यह कोई आश्चर्यजनक फैसला तो होगा नहीं लेकिन मुझे नहीं लगता है कि इससे कोई हल निकलने वाला है।अगर धोनी कप्तानी से हटा दिए जाते हैं तो मौजूदा टीम में मुझे तो कप्तानी के लिए कोई ठोस दावेदार नजर नहीं आ रहा है।धोनी के बाद आप किसे बनाओगे टेस्ट टीम का कप्तान?टीम के उपकप्तान सहवाग भी अपने उस रंग में नजर नहीं आ रहे हैं जिसके लिए वो जाने जाते हैं।वैसे तो धोनी के बाद सहवाग ही कप्तान के मुख्य दावेदार हैं लेकिन उनकी कप्तानी में भी वो बात नहीं है जो टीम के लिए फायदेमंद हो।युवाओं में अगर आप विराट कोहली की बात करें तो वो भी इस जिम्मेदारी के लायक नजर नहीं आ रहे हैं।सिर्फ एक पारी में उन्होंने शतक लगा लिया तो इसका यह मतलब नहीं कि वह टेस्ट टीम की कप्तानी के लायक हो गए।माना कि उनमें प्रतिभा है जिसपर किसी को संदेह नहीं है लेकिन उन्होंने भी पूरी सीरिज में अपनी प्रतिभा के अनुरूप प्रदर्शन नहीं किया।इसलिए भलाई इसी में है कि धोनी को अभी और मौका देना चाहिए।
   अगर टीम के खराब प्रदर्शन की बात की जाए तो पूरी टीम अपनी रंग में नजर नहीं आई।बैटिंग, बौलिंग, किसी भी क्षेत्र में टीम खड़ी नहीं उतरी।बौलिंग में ईशांत शर्मा ने तो लुटिया ही डूबो दी।पूरे सीरिज में कभी भी वो रंग में नजर नहीं आए।आर. आश्‌विन को भी सिलेक्टर्स ने जिस उम्मीद से टीम में चुना था, वह भी सिलेक्टर्स की उम्मीद पर खड़े नहीं उतरे।बौलिंग तो टीम की लगभग ठीक ही रही क्योंकि टीम के गेंदबाजों ने कुछ मौकों पर ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाजों को रन बनाने के मौके नहीं दिए।कुछ मौकों पर भारतीय गेंदबाजों ने ऑस्ट्रेलियाई टीम के शुरूआती विकेट झाड़ कर उनकी बल्लेबाजी की रीढ़ तोड़ दी।लेकिन वे पूरे सीरिज में निरंतर अच्छा प्रदर्शन करने में नाकाम रहे।टीम की बल्लेबाजी तो काफी शर्मनाक रही।टीम के बल्लेबाज कभी भी ऑस्ट्रेलियाई टीम से मुकाबला के मूड में नहीं दिखे।ऑस्ट्रेलियाई टीम के अनुभवहीन लेकिन प्रतिभाशाली गेंदबाजों के आगे हमारी वर्ल्ड-क्लास अनुभवी और प्रतिभाशाली बैटिंग लाइन-अप ने घुटने टेक दिए।विराट कोहली को छोड़ बाकी कोई भारतीय बल्लेबाज तो पूरी सीरिज में शतक भी नहीं लगा सके।गौतम गंभीर जिन्हें भारतीय टीम के बेस्ट ओपनरों में से एक माना जाता है, वो पूरे सीरिज में रन बनाने के लिए जूझते रहे।हमारे टीम के दोनों ओपनरों ने टीम को अच्छी शुरूआत देकर एक बड़े स्कोर की नींव रखने की अपनी जिम्मेदारी को बिल्कुल नहीं निभाया।सहवाग को देखकर तो लग ही नहीं रहा था कि ये वही सहवाग हैं जिन्होंने पिछले वेस्ट-इंडीज दौरे पर वन-डे इतिहास का दूसरा दोहरा शतक लगाकर आक्रामकता और टेक्निक के मेल का क्रिकेट इतिहास का सबसे अच्छा परिचय दिया था।कप्तान धोनी पूरे सीरिज के दौरान बल्लेबाजों को अच्छा प्रदर्शन करने के लिए बोलते रहे।कप्तान धोनी ने तो खुद भी पूरे सीरिज में बल्ले से अच्छा प्रदर्शन नहीं किया।
   टीम के खराब प्रदर्शन के बाद क्रिकेट फैंस ने हमारे त्रिदेव की जमकर आलोचना की।त्रिदेव ने तो खराब प्रदर्शन किया ही लेकिन टीम के युवाओं ने कौन सा अच्छा प्रदर्शन किया।क्या भारतीय टीम ऑस्ट्रेलिया में हमारे सीनियर्स की वजह से हारी है?नहीं।पूरी टीम ने मिलकर अच्छा प्रदर्शन नहीं किया तभी टीम हारी। हम आखिर किस मुँह से कहते हैं कि हमारे त्रिदेव को संन्यास ले लेना चाहिए?वे लगभग पिछले डेढ़ दशक से भारतीय क्रिकेट को अपनी सेवा दे रहे हैं।कठिन से कठिन परिस्थितियों में उन्होंने टीम का साथ निभाया है।कई मौकों पर उन्होंने टीम को जीत दिलाई है।भारतीय क्रिकेट की पहचान हैं हमारे त्रिदेव।ऐसे में एक या दो सीरिज से उनके प्रदर्शन को तौलना और उनके संन्यास लेने की माँग करना तो अपरिपक्वता और नासमझदारी भरी माँग है।भारतीय दर्शकों में यही दिक्कत है, अगर यह टीम जीत जाती तो सभी कहते कि यह सर्वश्रेष्ठ टीम है।जब टीम हार गई तो सभी हमारे त्रिदेव को संन्यास लेने की माँग करने लगे।माना कि त्रिदेव ने निराशाजनक प्रदर्शन किया लेकिन हार का सारा दोष उन पर डालना और उनके संन्यास की माँग करना तो बेमानी होगी।सुनिल गावस्कर हमारे सीनियर्स की आलोचना करते हैं तो वो तो उनका अधिकार है।वे भारतीय क्रिकेट के दिग्गज हैं।हमारे त्रिदेव के भी गुरु हैं।हम सभी उनका सम्मान करते हैं।इसलिए उन्होंने एक गुरू के नाते हमारे त्रिदेव को फटकार लगाई जो कि बिल्कुल सही है।लेकिन हम क्या उनके गुरु हैं कि हम उन पर संन्यास लेने का दबाव डाल रहे हैं?सचिन, द्रविड़ और लक्ष्मण हम से ज्यादा समझदार हैं और वो क्रिकेट को हमसे ज्यादा अच्छी तरह से जानते और समझते हैं।संन्यास का फैसला किसी भी खिलाड़ी का निजी फैसला होता है।हमें या बोर्ड को उन पर संन्यास का दबाव नहीं डालना चाहिए।वे इतने दिनों से क्रिकेट में हैं, वे अच्छी तरह से जानते हैं कि कब उनके संन्यास लेने का समय है।हम कहते हैं कि अब उनमें रन बनाने की क्षमता नहीं रह गई है।अरे! मैदान में वो खेलते हैं, वो हमसे अच्छी तरह से अपनी खेल की क्षमता को जानते हैं।त्रिदेव हमारे टीम का अभिन्न हिस्सा हैं, वे जो भी फैसला लेंगे टीम हित में ही लेंगे।
   कुछ लोग खराब प्रदर्शन का दोष आईपीएल को दे रहे हैं। माना कि आईपीएल में खिलाड़ी टेक्निक को भूलकर तेजी से रन बनाने में ही लग जाते हैं।लेकिन हार का एकमात्र कारण आईपीएल ही नहीं है।आईपीएल कोई खिलाड़ियों को जबर्दस्ती खेलने को नहीं कहता है।वो तो किसी खिलाड़ी की खुद की मर्जी है कि वह आईपीएल में खेलना चाहता है या नहीं।हार का कारण मुख्य रूप से टीम के सभी बल्लेबाजों का गैरजिम्मेदाराना तरीके से आउट होना और रन बनाने में बिल्कुल असफल होना है।टेस्ट मैचों में आपको विकेट पर टिककर खेलना होता है।आप अगर अपनी पारी के शुरूआती दस ओवर भी संभलकर डिफेंसिव मोड में खेल लेते हो तो ज्यादा संभावना है कि आप एक बड़ी पारी को अंजाम दे सकते हो।आप तीन-चार बड़े शॉट लगाकर एक अच्छी पारी टी-ट्वेंटी में खेल सकते हो, टेस्ट मैचों में नहीं।भारतीय टीम के खिलाड़ियों को रिकी पोंटिंग से सीख लेनी चाहिए।पिछले दो साल से उन्होंने टेस्ट में शतक नहीं लगाया था, और देखिए क्या शानदार वापसी की है उन्होंने।माइकल क्लार्क का भी कप्तानी करियर कुछ ठीक नहीं चल रहा था।पर उन्होंने भी जोरदार वापसी की।भारतीय क्रिकेट के बल्लेबाज भी उनकी तरह वापसी कर सकते हैं।
   भारतीय बल्लेबाजों को आलोचकों पर ध्यान न देकर अपने खेल पर ध्यान देना चाहिए।तभी वे वापसी कर पाएँगे।धोनी की कप्तानी में भारत जब हारने लगा तो ऑस्ट्रेलियाई मीडिया में कुछ इस तरह की खबर आई कि धोनी की कप्तानी वन-डे क्रिकेट के लिए ठीक है, टेस्ट क्रिकेट के हिसाब से वे बेहद सुस्त हैं।ये मीडिया उस वक्त कहाँ थी जब भारत धोनी की कप्तानी में पहली बार टेस्ट में नंबर-वन बना था।धोनी भारतीय टीम के सर्वश्रेष्ठ कप्तान हैं।उन्हें आलोचकों पर ध्यान न देकर अपनी वही चमक फिर से हासिल करनी होगी।अच्छे समय में तो सभी साथ देते हैं।बुरे वक्त में अपने भी साथ छोड़ जाते हैं।जब धोनी की कप्तानी में भारतीय टीम पहली बार टेस्ट में नंबर-वन बनी थी तब तो किसी को धोनी से ऐतराज नहीं था।बस एक या दो सीरिज से ही आपलोगों ने भारत के सर्वश्रेष्ठ कप्तान को हटाने की माँग कर दी।धोनी जैसा कप्तान मिलना बहुत मुश्किल है।माना कि मौजूदा सीरिज में उनका प्रदर्शन बेहद ही साधारण रहा था लेकिन हम उन्हें इतनी आसानी से नहीं खो सकते।किस खिलाड़ी या कप्तान के बुरे दिन नहीं आए हैं?सभी को इस दौर से गुजरना पड़ता है।धोनी को अभी हमारे साथ की जरूरत है।मैं धोनी और पूरी टीम इंडिया के साथ हूँ।और आप?      
       

Thursday, 26 January 2012

अन्ना हैं हमारे 'राष्ट्रीय शिक्षक'।

दोस्तों, वर्ष 2011 की शुरूआत देशहित के साथ हुई जब अन्ना ने भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के खिलाफ पूरे देश भर में लोगों को जागरूक किया और भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सख्त कानून की माँग को लेकर आंदोलन खड़ा किया।उस आंदोलन में उन्हें जनता का समर्थन भी प्राप्त हुआ।आंदोलन के सहारे पूरे देश की जनता ने एक मंच पर आकर भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद की।उस वक्त देश के हर एक नागरिक ने खुद को एक मंच पर पाया जिस मंच पर भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मुहिम छिड़ी हुई थी।ऐसा लग रहा था कि देर से ही सही पर लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ जागरूक हुए हैं।
   पर वर्ष के अंत में आखिर देश की जनता को ऐसा क्या हो गया कि उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई से अपना मुँह मोड़ लिया?बहुत से लोगों का यह मानना है कि आंदोलन की अति हो गई।लगातार इतने आंदोलन के लिए देश तैयार नहीं है।मैं पूछता हूँ कि देश भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के लिए नहीं तो किस के लिए तैयार है?भ्रष्टाचार से देश तबाह हो जाए, इसके लिए तैयार है?अगर अन्ना भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई जारी नहीं रखते तो क्या एक बार सिर्फ आंदोलन करके औपचारिकता पूरी करके लौट जाते?तब उनके विरोधी कहते कि अन्ना तो लड़ाई अधूरी छोड़ कर चले गए।आपको लगता है कि यह बहरी सरकार एक बार आंदोलन करने से ही मजबूत लोकपाल ले आती?तीन बार आंदोलन करने के बाद तो सरकार ने मजबूत लोकपाल लाया ही नहीं तो एक बार आंदोलन करके भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई अधूरी छोड़ने के बाद क्या खाक लाती।भ्रष्टाचार के खिलाफ हमें और एकजुटता की जरूरत थी जो देश की जनता की वजह से संभव नहीं हो पाया।भ्रष्टाचार के खिलाफ तीसरी लड़ाई में जब मुंबई में लोग नहीं पहुँचे तो भ्रष्टाचारियों ने अन्ना के बारे में कहा कि उनका जादू अब उतर चुका है।अन्ना कोई जादूगर थोड़े ही हैं कि उनका जादू उतर जाएगा।आंदोलन में जब लोग नहीं आए तो कुछ नेताओं ने अन्ना के व्यक्तित्व पर ही सवाल उठा दिए।अन्ना ने तो भ्रष्टाचार के खिलाफ लगातार लड़ाई जारी रखकर अपनी देशभक्ति दिखा दी।अब समय था देश की जनता को अपना परिचय देने का कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ कितने जागरूक हैं जिसमें वे असफल रहे।आंदोलन में जनता नहीं गई तो इसके दोषी अन्ना कैसे हो गए?उन्होंने तो अपना फर्ज़ निभाया।भ्रष्टाचार खत्म करने के उद्देश्य को पूरा करने के लिए एक और कदम उठाया।देश की जनता ने अपना फर्ज़ नहीं निभाया।कुछ नेताओं ने अन्ना पर आरोप लगाया कि वे रास्ता भटक चुके हैं।रास्ता अन्ना नहीं देश की जनता भटक चुकी है।अन्ना ने बहुत कोशिश की देश की जनता को सही रास्ता दिखाने की, लेकिन देश की जनता को यह मंजूर ही नहीं था।अगर कोई दोषी है तो वह देश की जनता है न कि अन्ना।
   समझ नहीं आता है कि आखिर जनता को अन्ना में ऐसा क्या दिखाई दिया कि उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई से भी खुद को अलग कर लिया।क्या वे अन्ना को गुनहगार मानने लगे हैं?अगर भ्रष्टाचार खत्म करना गुनाह है, तो हाँ मैं मानता हूँ कि अन्ना गुनहगार हैं।अगर एक भ्रष्टाचार मुक्त समाज की शुरूआत करना गुनाह है, तो हाँ अन्ना ने वह गुनाह किया है।अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों को एकजुट करना गुनाह है, तो हाँ अन्ना गुनहगार हैं।हम किस मुँह से अन्ना की बुराई करते हैं?अन्ना ने हमें भ्रष्टाचार से लड़ना सिखाया।जब सारा देश भ्रष्टाचार की चपेट में था उस वक्त अन्ना ने हमें उम्मीद की किरण दिखाई थी।कहने के लिए आज हम 1 अरब 21 करोड़ हैं लेकिन जब भ्रष्टाचार ने अपनी जड़ें मजबूत कर ली थी, उस वक्त किसी ने आवाज नहीं उठाई थी।उस 1 अरब 21 करोड़ में से भ्रष्टाचार के खिलाफ एकमात्र आवाज अन्ना और उनकी टीम की थी।एक समय भ्रष्टाचार देश के लिए स्वीकार्य हो चुका था।रोज अखबारों में भ्रष्टाचार के नए-नए किस्से मिलते थे।जब भ्रष्टाचार हद से ज्यादा हो गया तब अन्ना ने देश को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने की ठानी।भ्रष्टाचार के खिलाफ लोग कुछ हद तक जागरूक हुए भी थे तो अन्ना के ही बदौलत।आज सभी जानते हैं कि सीबीआई कैसे काम करती है।किसकी बदौलत?अन्ना के ही बदौलत।
   अन्ना पर आरोप ऐसे लगाए जाते हैं जैसे कि वह आंदोलन खुद के लिए करते हैं, जैसे वह लोकपाल की माँग खुद के लिए कर रहे हैं।वह जो भी करते हैं देश के लिए करते हैं।अन्ना को शौक नहीं है कि वह बुखार में भी आंदोलन करें।वह शौक से दस दिनों तक भूखे- नहीं थे।कोई चीज थी जो दस दिनों तक उन्हें भूखे रहने में मदद कर रही थी।कोई चीज थी जो तपती बुखार में भी उन्हें आंदोलन करने को मजबूर कर रही थी।वह कुछ और नहीं बल्कि उनकी देशभक्ति और उनका देशप्रेम ही था।जो भी अन्ना पर आरोप लगाते हैं मैं उन सभी से पूछता हूँ कि क्या आपमें वो जज्बा है कि आप देश की आम जनता के लिए दस दिनों तक भूखे रहें, तपती बुखार में भी अनशन करें।अगर हम उनके टीम के दो अहम सदस्यों अरविंद केजरीवाल और किरन बेदी की बात करें तो माना कि उनसे कुछ वित्तीय गलती हुई थी लेकिन इसके साथ-साथ उनका एक और पहलु भी है।वे जिन विभागों में जिन पदों पर थे वे किसी को भी गरीब से अमीर बनाने के लिए काफी हैं अगर कोई अपना ईमान बेचने के लिए तैयार हो जाए।ऐसे बहुत से उन्हीं के लेवल के अफसर होंगे जो कि विभिन्न विभागों में मौज कर रहे होंगे।आखिर क्या जरूरत थी अरविंद केजरीवाल और किरन बेदी को अपने-अपने पदों से इस्तीफा देकर समाज-सेवा में लगने की?वे भी चाहते तो आराम से अपने-अपने विभागों में मौज कर सकते थे लेकिन नहीं उन्होंने वो रास्ता नहीं अपनाया तो यह बात तो उनका देशप्रेम ही झलकाता है।किसी विद्वान ने कहा है कि किसी की बुराइयों पर नहीं बल्कि अच्छाइयों पर गौर करना चाहिए।
   आज जब अन्ना ने हमें भ्रष्टाचार से लड़ना सिखा दिया तो हम तरह-तरह की बातें कर रहे हैं।जैसे कि लोकपाल की जरूरत नहीं है, भ्रष्टाचार तो खुद से खत्म होगा।ये सब बेकार की बातें हैं।माना कि भ्रष्टाचार खुद से खत्म होगा लेकिन भ्रष्टाचार मिटाने का यही एकमात्र जरिया बिल्कुल नहीं हो सकता। भ्रष्टाचार मिटाने के लिए सख्त कानून की जरूरत है।सिर्फ लोकपाल ही नहीं उस जैसे और भी कई कानून की जरूरत है।लोकपाल तो भ्रष्टाचार मिटाने की शुरूआत है क्योंकि हमारे देश में भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए कोई ठोस कानून ही नहीं है।अन्ना हजारे ने तो भ्रष्टाचार मिटाने की शुरूआत की।कहना बहुत आसान है कि भ्रष्टाचार खुद से खत्म होगा लेकिन हकीकत में यह बहुत मुश्किल है।अगर भ्रष्टाचार सिर्फ खुद से ही खत्म होता तो आज तक खत्म हो गया रहता।खत्म तो दूर की बात है भ्रष्टाचार का नामोनिशान भी नहीं रहता।अगर भ्रष्टाचार खुद से ही खत्म होना रहता तो फिर कोर्ट की भी क्या जरूरत होती?पुलिस की क्या जरूरत रहती?अगर भ्रष्टाचार सिर्फ खुद से ही खत्म होना रहता तो न कोई चोर होता न कोई भ्रष्टाचारी।देश को एक सख्त लोकपाल की जरूरत है, कई और कानूनों की भी जरूरत है और जनता के साथ की जरूरत है तब खत्म होगा देश से भ्रष्टाचार।
   मेरी देश की जनता से यह गुजारिश है कि कभी यह न भूलें कि जब देश के लिए भ्रष्टाचार स्वीकार्य हो चुका था, जब देश को मानो लकवा मार गया था उस वक्त अन्ना ने अपने स्वास्थ्य को दांव पर लगाकर देश को भ्रष्टाचार से लड़ने का रास्ता दिखाया था।जब भ्रष्टाचार की जड़ें गुलामी की जंजीरों से ज्यादा मजबूत हो चुकी थी उस वक्त भ्रष्टाचार के खिलाफ एकमात्र आवाज अन्ना ने उठाई थी।अगर देश के 25% व्यक्ति भी अन्ना जैसे हो जाएँ तो भ्रष्टाचारियों की शामत आ जाएगी।देश को आतंकवाद से भी ज्यादा खतरा भ्रष्टाचार से है।आतंकवादियों के बारे में तो सभी जानते हैं कि वे सिर्फ तबाही ही कर सकते हैं लेकिन भ्रष्टाचारी तो चुपचाप भीतर ही भीतर देश को तबाह कर रहे हैं।
   यह बड़ा ही दुखद पहलु है कि देश की जनता के पास इतना समय तो है कि वे खराब खेलने वाले खिलाड़ियों के घर के आगे प्रदर्शन करें लेकिन उनके पास इतना भी समय नहीं है कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में भाग ले।ऐसा नहीं है कि भ्रष्टाचार सिर्फ सख्त कानून से ही खत्म हो जाएगा।भ्रष्टाचार मिटाने के लिए देश की जनता को जागरूक होना पड़ेगा।आज भ्रष्टाचारी सिर उठा कर घूम रहे हैं।अगर जनता जागरूक हो जाए और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कानून आ जाए तो भ्रष्टाचार को मजबूर होना पड़ेगा देश छोड़ने के लिए।
   देश के इतिहास का वो सबसे शर्मनाक दिन था जब कांग्रेस ने लोकपाल बिल की हत्या करके उसे लोकसभा में पेश किया।जिस कांग्रेस ने लोकपाल बिल जैसे भ्रष्टाचार निरोधक कानून की हत्या कर दी, जिसने अन्ना जैसे देशभक्त का सम्मान नहीं किया उस कांग्रेस की एक-एक जीत भ्रष्टाचार, घुसखोरी की जीत मानी जाएगी।
   मेरी भगवान से यह प्रार्थना है कि इस वर्ष एक मजबूत लोकपाल बिल पास हो और भ्रष्टाचार मिटाने की शुरूआत हो।देश की जनता जागरूक बने और भ्रष्टाचारियों का देश में दबदबा कम हो।भ्रष्टाचार का नामोनिशान मिटे ताकि देश को एक भ्रष्टाचार मुक्त और खुशहाल समाज नसीब हो।
जय हिन्द! जय भारत!